Saturday, September 20, 2008

माँ कभी ख़त्म नही होती ....


माँ लफ्ज़ ज़िंदगी का वो अनमोल लफ्ज है ... जिसके बिना ज़िंदगी, ज़िंदगी नहीं कही जा सकती ...

मेरा बचपन थक के सो गया माँ तेरी लोरियों के बग़ैर
एक जीवन अधूरा सा रह गया माँ तेरी बातो के बग़ैर

तेरी आँखो में मैने देखे थे अपने लिए सपने कई
वो सपना कही टूट के बिखर गया माँ तेरे बग़ैर.....

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आज तू बहुत दूर है मुझसे, पर दिल के बहुत पास है।
तुम्हारी यादों की वह अमूल्य धरोहर

आज भी मेरे साथ है,

ज़िंदगी की हर जंग को जीतने के लिए,
अपने सर पर मुझे महसूस होता
आज भी तेरा हाथ है।

कैसे भूल सकती हूँ माँ मैं आपके हाथों का स्नेह,

जिन्होने डाला था मेरे मुंह में पहला निवाला,
लेकर मेरा हाथ अपने हाथों में,

दुनिया की राहों में मेरा पहला क़दम था जो डाला

जाने अनजाने माफ़ किया था मेरी हर ग़लती को,

हर शरारत को हँस के भुलाया था,
दुनिया हो जाए चाहे कितनी पराई,
पर तुमने मुझे कभी नही किया पराया था,
दिल जब भी भटका जीवन के सेहरा में,
तेरे प्यार ने ही नयी राह को दिखाया था

ज़िंदगी जब भी उदास हो कर तन्हा हो आई,
माँ तेरे आँचल ने ही मुझे अपने में छिपाया था

आज नही हो तुम जिस्म से साथ मेरे,
पर अपनी बातो से , अपनी अमूल्य यादो से
तुम हर पल आज भी मेरे साथ हो..........
क्योंकि माँ कभी ख़त्म नही होती .........
तुम तो आज भी हर पल मेरे ही पास हो.........
माँ हर पल तुम साथ हो मेरे, मुझ को यह एहसास है


Friday, September 19, 2008

अजब संजोग

आज माँ के बारे में, कैसा अजीब दिन १९९१ ,१९ सित' आखरी दिन जब माँ से मिल रहा था।

लखनऊ का एस जी पी जी आई का वह कमरा आज भी मेरी आँखों के सामने । एक छोटे सा ओपरेशन जो २० तारीख को होना था, बी आई पी मरीज़ स्वास्त मंत्री तीमारदार, मुख्य मंत्री हाल चाल ले रहा हो तो बड़ा डोक्टर आया ओपरेशन करने जो प्रोफेसर था और अनास्तासिया के समय सब कुछ ख़त्म।

विशिस्ट होने कि सजा मिली हमको । इससे आगे फिर कभी आज नहीं क्योंकि आज मेरी माँ बहुत दूर चली गई । और सब कुछ रह गया उनके पीछे । आज जो हम है वह उन्ही कि दें थी । पापा का संसद सदस्य होने में उनकी भूमिका सिर्फ यादें और यादे ...................

Sahitya Shilpi