Wednesday, December 31, 2008

ऐ मां तेरी सूरत से अलग …..

image मैं एक विद्यार्थी था जब “ऐ मां तेरी सूरत से अलग भगवान की सूरत क्या होगी, क्या होगी” बहुत जनप्रिय हुआ था. पता नहीं किसकी रचना थी, लेकिन इस एक वाक्य ने एक ऐसे तथ्य को समाज के समक्ष रखा था जिसे हम में से अधिकतर लोग जब पहचानने की हालत में पहुंचते हैं तब तक बहुत देर हो चुकी होती है.

कारण यह है कि अनादि काल से मातायें किसी भी प्रकार की मांग रखे बिना, अपनी इच्छाओं को मन में ही छिपा कर रख कर, अपने बालबच्चों का पालन पोषण करती आई हैं.

आप किसी सरकारी दफ्तर में चले जाएं तो वहां का सबसे छोटा कर्मचारी भी अपने आप को लाट साहब से कम नहीं समझता. जब तक आप उसकी मनौती एवं इनामकिताब नही कर देते तब तक वह टस से मस नहीं होता अत: हमें उसकी कीमत एवं उसकी ताकत का अनुमान हो जाता है. आप किसी कबाडिया के यहां जाकर कबाड का सबसे निकृष्ट टुकडा उठा लीजिये, लेकिन वह कीमत चुकाने के बाद ही आप घर ले जा सकते है, अत: आपको कबाडिया के “मूलधन” का अनुमान हो जाता है.

समाज के किसी भी कोने की ओर चले जाईये, हर कोई अपनी सेवा के लिये कीमत पहले मांगता है और आधी अधूरी “सेवा” बाद में देता है और उसके साथ यह शर्त लगा देता है कि सेवा “जहां है, जैसी है” के आधार पर ही मिलेगी, चाहिये तो लो, नही तो छोड कर फूट लो. यहां तक कि भिखारी को भी उसके मनोवांछित पैसा न मिले तो वह आपको पैसे वापस दे देता है और कहता है कि यह अपने घरवाली को दे देना, क्योकि इतने पैसे पर तो मेरा कुत्तर भी मुड कर नहीं देखता है.

कुल मिला कर, हम एक ऐसे समाज में जी रहे हैं जहां हर कोई पहले अपनी कीमत, तुष्टि, मन्नतमनौती, मिन्नत देखता है और उसके बाद आधी अधूरी सेवा करता है. लेकिन इस तरह के कृतघ्न समाज में “माँ” कभी भी शर्तें नहीं रखती. वह हमेशा देती है  लेकिन पलट कर मांगती नहीं है. यही कारण है कि हम में से अधिकतर लोग अपने जीवन की सबसे अमूल्य धरोहर का मूल्य तब तक नहीं पहचानते जब तक वह हम को अप्राप्य नहीं हो जाती.

आईये 2009 में हम माँ के महत्व को पहचानने, उसकी सेवा के लिये रास्ते ढूंढने एवं उसके योगदान के छुपे पहलुओं को उजागर करने के लिये इस चिट्ठे का उपयोग करें!!

जो पाठक इस चिट्ठे के साथ जुडना चाहते हैं वे लोग कृपया Admin.Mataashri@gmail.com पर मुझे अपनी रचनायें प्रेषित कर दें. अपना परिचय एवं अपने चिट्ठे का जालपता भी दे दें जिसे आलेख के अंत में जोडा जा सके.

आप सब को 2009 मुबारक हो!

सस्नेह – शास्त्री (सारथी)

Mother and Child by littlemisskool

Thursday, December 25, 2008

मातृत्व

उसके आने के अहसास से
सिहर उठती हूँ
अपने अंश का
एक नए रूप में प्रादुर्भाव
पता नहीं क्या-क्या सोच
पुलकित हो उठती हूँ
उसकी हर हलचल
भर देती है उमंग मुझमें
बुनने लगी हूँ अभी से
उसकी जिन्दगी का ताना-बाना
शायद मातृत्व का अहसास है।

आकांक्षा यादव
w/o कृष्ण कुमार यादव
kkyadav.y@rediffmail.com

Wednesday, December 24, 2008

माँ छुपा लो ना मुझे अपने ही आँचल में कहीँ


समझ सकती हूँ मैं माँ ..
वोह दिन कितना ख़ास होगा,
जब कुछ लम्हों के इंतज़ार के बाद एक कली की तरह
मैं तुम्हारे दोनो हाथों में पूरी सिमट गयी हूंगी ,
देखकर मेरी नन्ही नन्ही आँखें रोशनी की तरह
तुम्हारी आँखों में भी चमक भर गयी होगी
फिर अपनी चमकती आँखों में ख्वाब लेकर
प्यार से तुमने मेरे माथे को चूमा होगा
तब तुम्हे ख़ुद पे ही बहुत गुरूर हुआ होगा
जब मैने तुम्हे पहली बार माँ कहा होगा

नये ख्वाबों की नयी मंज़िल सामने देख
तुमने हाथ पकड़ कर मुझे चलना सिखाया होगा
मुझे बार बार गिरते देख,
तुम्हारा दिल भी दर से कंपकापाया होगा
और अपने प्यार भरे आँचल में छुपा कर
कई ज़ख़्मो से मुझे बचाया होगा


फिर धीरे धीरे चढी मैने अपनी मंज़िलों की सीढ़ियाँ
और दुनिया की भीड़ में तेरा हाथ मुझसे कहीं छूट गया
तूने फिर भी थाम कर संभालना सिखाया मुझे
अपनी सीखों से दुनियादारी की अच्छी बुरी बातें बताई मुझे
पर मैने हमेशा ही अपनी ज़िद्द से ठुकराया उसे
समझ सकती हूँ आज मैं दिल से कि
मेरी ज़िद्द के आगे तुमने अपने दिल पे पत्थर रखा होगा


पर आज मुझे यक़ीन हो चला है कि माँ तुम सही थी
और अब मैं एक बार फिर-
वापिस तुम्हारे दोनो हाथों में सिमटना चाहती हूँ
तुम्हारे प्यारे आँचल में फिर छिपना चाहती हूँ
तुम्हारे हाथों के सहारे एक बार फिर से अपने
ड़गमागते हुए कदमाओं को संभालना चाहती हूँ


माँ छुपा लो ना मुझे अपने ही आँचल में कहीँ

मेघा भाटिया ...[पुत्री रंजू भाटिया ]

Tuesday, December 16, 2008

माँ का पत्र

घर का दरवाजा खोलता हूँ
नीचे एक पत्र पड़ा है
शायद डाकिया अंदर डाल गया है
उत्सुकता से खोलता हूँ
माँ का पत्र है
एक-एक शब्द
दिल में उतरते जाते हैं
बार-बार पढ़ता हूँ
फिर भी जी नहीं भरता
पत्र को सिरहाने रख
सो जाता हूँ
रात को सपने में देखता हूँ
माँ मेरे सिरहाने बैठी
बालों में उंगलियाँ फिरा रही है।


कृष्ण कुमार यादव
http://kkyadav.blogspot.com/
kkyadav.y@rediffmail.

Tuesday, December 9, 2008

मासूम स्मृतियाँ





डूब गई पुरानी सजल
मासूम यादों में
जब मैं मात्र साढ़े सात साल की थी
माँ गई थीं यात्रा पर
यात्रा थी बड़ी कठिन
लम्बी और दुरूह
विदाई के समय
भजन और मंगलगीतों से भीगा
पर उदास वातावरण
सहमा घर का आँगन
सूनी घर की पौरी
दादी के मुख से
आशीष की अजस्र धारा
आखों से छलकते अश्रु
भाई-बहिनों की
माँ को निहारतीं
उदास,मौन और सजल आँखें
कह रही थीं
अपनी ही भाषा में कुछ-कुछ
माँ की आँखों ने
पढ़ा हमारे मन को
पास आकर सहलाया,दुलारा
जाते समय माँ ने दिया
मुझे और मेरी बड़ी बहिन को
आठ आने का एक-एक सिक्का
और मेवा से भरा हरे रंग का
टीन का छोटा डिब्बा
मेवा के साथ-साथ
भरा था जिसमें
माँ का प्यार-दुलार
और माँ की अनगिन यादें
एक रेशमी रूमाल
जिसमें बँधा था डिब्बा
उस पर छपा हुआ था
सन् उन्नीस सौ अड़तीस के
बारह महीनों का कलैंडर
डिब्बा और रूमाल
मेरे अनमोल खजाने में
आज भी हैं सुरक्षित
आज भी माँ के शब्द
गूँज रहे हैं कानों में
’ बेटी! जब मन करे
दोनों बहिनें मेवा खा लेना
पैसों से कुछ ले लेना
पर हाँ! दादी को मत बताना
किसी को परेशान भी मत करना
मैं जल्दी ही यात्रा से आ जाऊँगी ‘
उस समय मेरी छोटी बहिन
जो थी मात्र सवा साल की
गई थी माँ के साथ यात्रा पर
जाने के बाद !
कभी लौटकर नहीं आई माँ
उड़ गई हरियल तोते की तरह
क्रूर नियति ने
छीन लिया माँ का दुलार
कर दिया मातृविहीन
आज जब भी आती है
माँ की याद
डबडबाती हैं आँखें
डगमगाते हैं क़दम
लड़खड़ाता है मन तो
माँ के द्वारा दिए गए
मेवा के डिब्बे की हरियाली
कर देती है मन को हरा
और जब भी खोलती हूँ उसे
तो स्मृतियों के बादल
उड़ने लगते हैं मेरे इर्द-गिर्द
वे थपथपाते हैं मुझे
दिखाते हैं राह
जगाते हैं हिम्मत
विषमताओं में जीने की !
जब देखती हूँ रूमाल
तो माँ की मीठी-मीठी यादें
लगती हैं गुदगुदाने
समय की मार झेलते-झेलते
हो गए हैं रूमाल में अनगिन छेद
मैं उन छोटे-छोटॆ छेदों से
नहीं रिसने देती हूँ रेत बनी
अपनी मासूम स्मृतियों को
और पुनः रख लेती हूँ सहेजकर
मन की अलमारी में !

डॉ. मीना अग्रवाल

Saturday, December 6, 2008

तन्हा माँ के सपने....

माँ,
एक शब्द नहीं,
एक भावना है,
मानव के चरणबद्ध विकास,
उसके बढ़ते स्वरुप की अवधारणा है.
माँ,
जो भूलकर अपना अस्तित्व,
संवारती है
मनुष्य का अस्तित्व,
बड़े जतन से,
बड़े ही मन से,
गढ़ती है एक मनुष्य.
माँ,
जिसके किसी भी कृत्य के पीछे,
किसी भी कार्य के पीछे
नहीं छिपा होता स्वार्थ,
नहीं चाहती उसका कोई अर्थ,
बस लगी रहती है,
सवारने में उसे,
जो निर्मित है उसी के रक्त से,
सृजित है उसी के अंश से.

माँ,
अपने सपनों को,
अपने बच्चे के सपनों में मिला कर,
गिनती है एक-एक दिन,
देखती रहती है सपने,
अपने सपने के सच होने सपने,
उस खुशनुमा दिन के सपने,
जब सच होंगे उसके सपने,
उसके बच्चे के सपने.
फ़िर आता है एक वो भी दिन,
जब संवारते लगते हैं सपने,
महकने लगते हैं सपने.

माँ,
इस महकते सपनों के बीच भी,
सच होते सपनों के बीच भी,
रह जाती है अकेली,
रह जाती है तनहा,
क्योंकि उसका सपना,
उसका अपना,
छोड़ कर उसे सपनों की दुनिया में,
चला जाता है
कहीं दूर,
सच करने को अपने सपने.
और माँ,
माँ, अकेले ही रहकर
अपने सपनों के बीच,
दुआएं देती है,
आशीष देती है कि
सच होते रहें उसके बच्चे के सपने,
बच्चे के सपनों में मिले उसके सपने.

डॉ0 कुमारेन्द्र सिंह सेंगर
dr.kumarendra@gmail.com

Thursday, December 4, 2008

मेरा प्यारा सा बच्चा

मेरा प्यारा सा बच्चा
गोद में भर लेती है बच्चे को
चेहरे पर नजर न लगे
माथे पर काजल का टीका लगाती है
कोई बुरी आत्मा न छू सके
बाँहों में ताबीज बाँध देती है।

बच्चा स्कूल जाने लगा है
सुबह से ही माँ जुट जाती है
चैके-बर्तन में
कहीं बेटा भूखा न चला जाये।
लड़कर आता है पड़ोसियों के बच्चों से
माँ के आँचल में छुप जाता है
अब उसे कुछ नहीं हो सकता।

बच्चा बड़ा होता जाता है
माँ मन्नतें माँगती है
देवी-देवताओं से
बेटे के सुनहरे भविष्य की खातिर
बेटा कामयाबी पाता है
माँ भर लेती है उसे बाँहों में
अब बेटा नजरों से दूर हो जायेगा।

फिर एक दिन आता है
शहनाईयाँ गूँज उठती हैं
माँ के कदम आज जमीं पर नहीं
कभी इधर दौड़ती है, कभी उधर
बहू के कदमों का इंतजार है उसे
आशीर्वाद देती है दोनों को
एक नई जिन्दगी की शुरूआत के लिए।

माँ सिखाती है बहू को
परिवार की परम्परायें व संस्कार
बेटे का हाथ बहू के हाथों में रख
बोलती है
बहुत नाजों से पाला है इसे
अब तुम्हें ही देखना है।

माँ की खुशी भरी आँखों से
आँसू की एक गरम बूँद
गिरती है बहू की हथेली पर। 

कृष्ण कुमार यादव                      
भारतीय डाक सेवा  | वरिष्ठ डाक अधीक्षक
कानपुर मण्डल, कानपुर-208001
Kkyadav.y@rediffmail.com

Saturday, November 29, 2008

माँ

माँ! तुम तो
मुझे अकेला छोड़
चली गई हो दूर
बहुत दूर
तुमने नहीं सिखाया
हिम्मत से जीना
समय की मार को
मजबूती से सहना
शायद इसलिए कि
तुम्हें विश्वास था
अपनी लाडली पर
कि कहीं भी
किसी भी परिस्थिति में
तुम्हारी ये बेटी
हारेगी नहीं
टूटेगी नहीं
पर माँ, आज मैं
बहुत टूट गई हूँ
आज बिल्कुल अकेली
हो गई हूँ मैं
आज तो दोगी
मुझे सांत्वना
और मेरा हाथ पकड़
मेरी उँगली पकड़
चढ़ाओगी
उन सीढ़ियों पर
जिन पर चढ़ना
मैं भूल गई हूँ
डरने लगा है मन
आगे बढ़ने में
और ऊँची-नीची,
टेढ़ी-मेढ़ी सीढ़ियों पर चढ़ने में
माँ ! आओ एक बार
दो मुझे हौसला
मेरे अंदर भर दो हिम्मत
माँ ! उर में समाकर
मेरे उदास और
एकाकी मन को सहलाओ
कोई ऐसी युक्ति बताओ
कि जीवन की शेष सीढ़ियाँ
आस्था,विश्वास और
धैर्य के साथ हिम्मत से
चढ़ सकूँ और पा सकूँ
उस सच्चाई को
उस यथार्थ को
जिससे मैं बहुत दूर हूँ
माँ ! तुम आओगी न
!फिर तुम्हारी ये बेटी
कभी, कहीं, किसी भी
स्थिति- परिस्थिति में
न तो डगमगाएगी और
न कभी मात खाएगी !

डॉ. मीना अग्रवाल

Wednesday, November 19, 2008

प्रकृति इन मांओं के साथ क्‍यो अन्‍याय कर रही हैं ?

मॉ शब्‍द को सुनते ही सबसे पहले परंपरागत स्‍वरूपवाली उस मॉ की छवि ऑखो में कौंधती है , जिसके दो चार नहीं , पांच छह से आठ दस बच्‍चे तक होते थे , पर उन्‍हें पालने में उनके चेहरे पर शिकन तक नहीं आती थी। हमारे यहां 90 के दशक तक संयुक्‍त परिवार की बहुलता थी। अपने सारे बच्‍चों की देखभाल के साथ ही साथ उन्‍हें अपनी पूरी युवावस्‍था ससुराल के माहौल में अपने को खपाते हुए सास श्‍वसुर के आदेशों के साथ ही साथ ननद देवरों के नखरों को सहनें में भी काटना पडता था।

दिनभर संयुक्‍त परिवार की बडी रसोई के बडे बडे बरतनों में खाना बनाने में व्‍यस्‍त रहने के बाद जब खाने का वक्‍त होता , अपने प्‍लेट में बचा खुचा खाना लेकर भी वह संतुष्‍ट बनीं रहती, पर बच्‍चों की देखभाल में कोई कसर नहीं छोडती थी। पर युवावस्‍था के समाप्‍त होते ही और वृद्धावस्‍था के काफी पहले ही पहले ही उनके आराम का समय आरंभ हो जाता था। या तो बेटियां बडी होकर उनका काम आसान कर देती थी या फिर बहूएं आकर। तब एक मालकिन की तरह ही उनके आदेशों निर्देशों का पालन होने लगता था और वह घर की प्रमुख बन जाया करती थी। अपनी सास की जगह उसे स्‍वयमेव मिल जाया करती थी।

पर आज मां का वह चेहरा लुप्‍त हो गया है। आज की आधुनिक स्‍वरूपवाली मां , जो अधिकांशत: एकल परिवार में ही रहना पसंद कर रही हैं , के मात्र एक या दो ही बच्‍चे होते हैं , पर उन्‍हें पालने में उन्‍हें काफी मशक्‍कत करनी पडती है। आज की महत्‍वाकांक्षी मां अपने हर बच्‍चे को सुपर बच्‍चा बनाने की होड में लगी है। इसलिए बच्‍चों को भी नियमों और अनुशासन तले दिनभर व्‍यस्‍तता में ही गुजारना पडता है। आज के युग में हर क्षेत्र में प्रतियोगिता को देखते हुए आधुनिक मां की यह कार्यशैली भी स्‍वाभाविक है , पर आज की मॉ एक और बात के लिए मानसि‍क तौर पर तैयार हो गयी है। अपने बच्‍चे के भविष्‍य के निर्माण के साथ ही साथ यह मां अपना भविष्‍य भी सुरक्षित रखने की पूरी कोशिश में रहती है , ताकि वृद्धावस्‍था में उन्‍हे अपने संतान के आश्रित नहीं रहना पडे यानि अब अपने ही बच्‍चे पर उसका भरोसा नहीं रह गया है।

मात्र 20 वर्ष के अंदर भारतीय मध्‍यम वर्गीय समाज में यह बडा परिवर्तन आया है , जिसका सबसे बडी शिकार रही हैं वे माएं , जिनका जन्‍म 50 या 60 के दशक में हुआ है और 70 या 80 के दशक में मां बनीं हैं। उन्‍होने अपनी युवावस्‍था में जिन परंपराओं का निर्वाह किया , वृद्धावस्‍था में अचानक से ही गायब पाया है। इन मांओं में से जिन्‍हें अपने पति का सान्निध्‍य प्राप्‍त है या जो शारीरिक , मानसिक या आर्थिक रूप से मजबूत हैं , उनकी राह तो थोडी आसान है , पर बाकी के कष्‍ट का हम अनुमान भी नहीं लगा सकते। संयुक्‍त परिवार मुश्किल से बचे हैं ,विवाह के बाद बहूएं परिवार में रहना नहीं पसंद करने लगी हैं। सास की मजबूरी हो , तो वह बहू के घर में रह सकतीं हैं , पर वहां उसके अनुभवों की कोई पूछ नही है , वह एक बोझ बनकर ही परिवार में रहने को बाध्‍य है , अपने ही बेटे बहू के घर में उसकी हालत बद से भी बदतर है। कहा जाता है कि प्रकृति को भूलने की आदत नहीं होती है , जो जैसे कर्म करता है , चाहे भला हो या बुरा , वैसा ही फल उसे प्राप्‍त होता है , एक कहावत भी है ‘जैसी करनी वैसी भरनी’ यदि यह बात सही है , तो प्रकृति इन मांओं के साथ क्‍यो अन्‍याय कर रही हैं ?

Friday, November 14, 2008

आवाज़ के आने में भी देर लगती है ....

                                            आलेख: पा.ना.सुब्रमणियन




फ़ोन की घंटी बजती है ... ट्रिंग ट्रिंग

अम्मा ने उठाया: हाँ मैं बोल रही हूँ.

कुछ देर कोई आवाज़ नहीं आती

फिर उधर से : हाँ कौन?

अम्मा: अरे अम्मा बोल रही हूँ

वेंकोवर (कनाडा) से बिस्सु बेटे का फ़ोन था बोला

अरे बिस्सु बोल रहा हूँ

अम्मा: हाँ बोल बेटा सब ख़ैरियत तो है. लेकिन ये मेरी आवाज़ में कौन बोल रहा है.

(अम्मा की आवाज़ प्रतिध्वनि के रूप में सुनाई पड़ती है)

बिस्सु बोला: अम्मा मैं हीं तो बोल रहा हूँ, लगता है तुम सठिया गयी हो. आज दीवाली है ना इसलिए मेरा स्पेशल पाय लागी (प्रणाम)

अम्मा: अरे बेटा आशीर्वाद आशीर्वाद लेकिन सुन .. आज थोड़े ही है, वो तो कल थी.

बिस्सु: हाँ माँ हमारे लिए आज ही है.

अम्मा: नहीं बेटा हमारी तो हो गयी, हम लोग मद्रासी हैं ना, हम लोग नरक चतुर्दशी को ही मानते हैं. आज तो अमावस्या है.

बिस्सु: ठीक तो है ना माँ आज नरक चतुर्दशी ही तो है. आज हम लोगों ने सुबह ही फटाके भी छुड़ाए. घर के सामने नहीं. कुछ दूर एक मैदान में.

अम्मा: बेटा आज मंगलवार है, नरक चतुर्दशी सोमवार को थी

बिस्सु: आज सोमवार ही तो है ना माँ.

अच्छा तो तू कल बोल रहा है ना और मैं आज सुन रही हूँ!

नहीं अम्मा मै यहाँ से आज ही बोल रहा हूँ और तुम भी आज ही सुन रहे हो.

अम्मा: रख दे फ़ोन, दिमाग़ खराब कर रहा है.

Thursday, November 13, 2008

मां को अनाथालय ??

आज ऐसे युवाओं की कमी नहीं है जो अपने स्वार्थ की पूर्ति कि लिए अपनी जननी को अनाथालय या सडक पर छोडने के लिये तय्यार हैं.  इस विषय पर दो महत्वपूर्ण आलेख माँ के पाठकों की नजर में लाना चाहता हूँ:

 

..

Wednesday, November 12, 2008

डॉ अमर ज्योति - अम्मा पर !

डॉ अमर ज्योति की अम्मा पर लिखी रचना जब पढने लगा तो पहली बार लगा कि इस रचना को दोबारा पढूं, फिर तीसरी बार और फिर चौथी बार एक एक लाइन को बार बार पढने का मन किया ! हर लाइन का बेहद गूढ़ अर्थ है इसमें ! बच्चे को छाया एवं सुरक्षा महसूस होती रहे और अभाव महसूस ना हों इसके लिए माँ क्या क्या प्रयत्न करती है, शायद ही कोई पिता यह महसूस कर पाया होगा !



सरदी में गुनगुनी धूप सी, ममता भरी रजाई अम्मा,
जीवन की हर शीत-लहर में बार-बार याद आई अम्मा।
भैय्या से खटपट, अब्बू की डाँट-डपट, जिज्जी से झंझट,
दिन भर की हर टूट-फूट की करती थी भरपाई अम्मा।

कभी शाम को ट्यूशन पढ़ कर घर आने में देर हुई तो,
चौके से देहरी तक कैसी फिरती थी बौराई अम्मा।

भूला नहीं मोमजामे का रेनकोट हाथों से सिलना;
और सर्दियों में स्वेटर पर बिल्ली की बुनवाई अम्मा।

बासी रोटी सेंक-चुपड़ कर उसे पराठा कर देती थी,
कैसे थे अभाव और क्या-क्या करती थी चतुराई अम्मा।

Monday, November 10, 2008

दुनिया का सबसे आसान शब्‍द है मां

दुनिया का सबसे खूबसूरत शब्‍द, सबसे प्‍यारा शब्‍द है मां। किसी एक महिला के मां बनते ही पूरा घर ही रिश्‍तों से सराबोर हो जाता है। कोई नानी तो कोई दादी , कोई मौसी तो कोई बुआ , कोई चाचा तो कोई मामा , कोई भैया तो कोई दीदी , नए नए रिश्‍ते को महसूस कराती हुई पूरे घर में उत्‍सवी माहौल तैयार करती है एक मां। लेकिन इसमें सबसे बडा और बिल्‍कुल पवित्र होता है अपने बच्‍चे के साथ मां का रिश्‍ता। यह गजब का अहसास है , इसे शब्‍दों में बांध पाना बहुत ही मुश्किल है।

प्रसवपीडा से कमजोर हो चुकी एक महिला सालभर बाद ही सामान्‍य हो पाती है। मां बनने के बाद बच्‍चे की अच्‍छी देखभाल के बाद अपने लिए बिल्‍कुल ही समय नहीं निकाल पाती है। बच्‍चा स्‍वस्‍थ और सानंद हो , तब तो गनीमत है ,पर यदि कुछ गडबड हुई , जो आमतौर पर होती ही है, बच्‍चे की तबियत के अनुसार उसे खाना मिलता है , बच्‍चे की नींद के साथ ही वह सो पाती है , बच्‍चे की तबियत खराब हो , तो रातरातभर जागकर काटना पडता है , परंतु इसका उसपर कोई प्रभाव नहीं पडता , मातृत्‍व का सुखद अहसास उसके सारे दुख हर लेता है।

परंपरागत ज्‍योतिष में मां का स्‍थान चतुर्थ भाव में है। यह भाव हर प्रकार की चल और अचल संपत्ति और स्‍थायित्‍व से संबंध रखता है। यह भाव सुख शांति देने से भी संबंधित है। हर प्रकार की चल और अचल संपत्ति का अर्जन अपनी सुख सुविधा और शांति के लिए ही लोग करते हैं । भले ही उम्र के विभिन्‍न पडावों में सुख शांति के लिए लोगों को हर प्रकार की संपत्ति को अर्जित करना आवश्‍यक हो जाए , पर एक बालक के लिए तो मां की गोद में ही सर्वाधिक सुख शांति मिल सकती है , किसी प्रकार की संपत्ति का उसके लिए कोई अर्थ नहीं।

यूं तो एक बच्‍चा सबसे पहले ओठों की स‍हायता से ही उच्‍चारण करना सीखता है , इस दृष्टि से प फ ब भ और म का उच्‍चारण सबसे पहले कर सकता है। पर बाकी सभी रिश्‍तों को उच्‍चारित करने में उसे इन शब्‍दों का दो दो बार उच्‍चारण करना पडता है , जो उसके लिए थोडा कठिन होता है , जैसे पापा , बाबा , लेकिन मां शब्‍द को उच्‍चारित करने में उसे थोडी भी मेहनत नहीं होती है , एक बार में ही झटके से बच्‍चे के मुंह से मां निकल जाता है यानि मां का उच्‍चारण भी सबसे आसान।

मां शब्‍द के उच्‍चारण की ही तरह मां के साथ रिश्‍ते को निभा पाना भी बहुत ही आसान होता है। शायद ही कोई रिश्‍ता हो , जिसे निभाने में आप सतर्क न रहते हों , हिसाब किताब न रखते हों , पर मां की बात ही कुछ और है। आप अपनी ओर से बडी बडी गलती करते चले जाएं , माफी मांगने की भी दरकार नहीं , अपनी ममता का आंचल फैलाए अपने बच्‍चे की बेहतरी की कामना मन में लिए बच्‍चे के प्रति अपने कर्तब्‍य पथ पर वह आगे बढती रहेगी।

पर कभी कभी मां का एक और रूप सामने आ जाता है , बच्‍चे को मारते पीटते या डांट फटकार लगाते वक्‍त प्रेम की प्रतिमूर्ति के क्रोध को देखकर बडा अजूबा सा लगता है। पर यह एक मां की मजबूरी होती है , उसे दिल पर पत्‍थर रखकर अपना वह रोल भी अदा करना पडता है। इस रोल को अदा करने के लिए उसे अंदर काफी दर्द झेलना पडता है , पर बच्‍चे के बेहतर भविष्‍य के लिए वह यह दर्द भी पी जाती है।

पर हम उनकी इस सख्‍ती , इस कठोरता को याद रखकर अपने मन में उनके लिए गलत धारणा भी बना लेते हैं। साथ ही कर्तब्‍यों के मार्ग पर चलती आ रही मांओं को अधिकारों से वंचित कर देते हैं। जब उन्‍हें हमारी जरूरत होती है , तो हम वहां पर अनुपस्थित होते हैं। ऐसा नहीं होना चाहिए। हमें याद रखना चाहिए कि कोई हमारे साथ भी यही व्‍यवहार करे तो हमें कैसा लगेगा ?

Thursday, November 6, 2008

अपनी माँ को धुंधली यादों में ढूँढता बच्चा !

आदरणीय शास्त्री जी,

"माँ " ब्लाग पर शामिल होने का, आप जैसे विद्वान् सम्मानित लेखक का अनुरोध टालने का प्रयत्न, मेरे जैसे व्यक्ति के लिए एक अस्वाभाविक घटना थी ! आपने कहीं न कहीं मुझे भी "नखरैल" समझा होगा जो अपनी विद्वता और लेखन पर बड़ा गर्व करते घूमते हैं ! मगर न चाहते हुए भी मैं आपका दूसरी बार का आदेश ठुकरा नही पाया !

क्यालिखूं मैं यहाँ माँ के बारे में ! यह एक ऐसा शब्द है जो मैंने कभी किसी के लिए नही बोला, मुझे अपने बचपन में ऐसा कोई चेहरा याद ही नही जिसके लिए मैं यह प्यारा सा शब्द बोलता ! अपने बचपन की यादों में उस चेहरे को ढूँढने का बहुत प्रयत्न करता हूँ मगर हमेशा असफल रहा मैं अभागा !

मुझे कुछ धुंधली यादें हैं उनकी... वही आज पहली बार लिख रहा हूँ ....जो कभी नही लिखना चाहता था !
-लोहे की करछुली (कड़छी) पर छोटी सी एक रोटी, केवल अपने इकलौते बेटे के लिए, आग पर सेकती माँ....
-बुखार में तपते, अपने बच्चे के चेचक भरे हाथ, को सहलाती हुई माँ ....
-जमीन पर लिटाकर, माँ को लाल कपड़े में लपेटते पिता की पीठ पर घूंसे मारता, बिलखता एक नन्हा मैं ...मेरी माँ को मत बांधो.....मेरी माँ को मत बांधो....एक कमज़ोर का असफल विरोध ...और वे सब ले गए मेरी माँ को ....

बस यही यादें हैं माँ की ......

तुम सुन रही हो न माँ ।

माँ केवल माँ नही होती
वह होती है शिक्षक
रोटी बेलते बेलते केवल अक्षर और अंक ही नही
और भी बहुत कुछ पढाती है
यह करो वह नही, कहते कहते संस्कारित करती है
दंड भी देती है कई बार कठोर
हमारी हर गतिविधि पर होती है उसकी पैनी नजर
और हमारी सुरक्षा सर्वोपरि
माँ केवल माँ नही होती
वह होती है रक्षक
सिखाती है इस दुनिया में रहने और जीने के तरीके
दुनिया में हमेशा धोका समझ कर चलो
भरोसा मत करो जाने पहचाने का भी,
अनजान का तो बिलकुल भी नही
य़हाँ वहाँ अकेले बिना जरूरत न जाना
कितनी बुरी लगती थी तब उसकी यह टोका टाकी
अब पता चलता है कितनी सही थी माँ
माँ केवल माँ नही होती
वह होती है परीक्षक
उसकी सिखाई बातों को हमने कितना आत्मसात किया
यह जाने बिना उसे चैन कहाँ
हलवा बनाओ, बर्तन चमकाओ
सवाल करो,जवाब तलाशो, कविता सुनाओ
हजार चीजें ।
माँ होती है परिचारिका भी
और कभी कभी डॉक्टर
बुखार में कभी भी आँख खुले माँ हमेशा सिरहाने
माथे पर पट्टियाँ रखते हुए
छोटे मोटे बुखार, सर्दी जुकाम तो वह
अपने अद्रक वाली बर्फी या काढे से ही ठीक कर देती
तब माँ कितनी अच्छी लगती
आज जब सिर्फ उसकी याद ही बाकी है
उसकी महत्ता समझ आ रही है ।
तुम सुन रही हो न माँ ?

Wednesday, October 29, 2008

माँ के ख़त


माँ ..
दीवाली के रोशन दीयों की तरह
मैंने तुम्हारी हर याद को
अपने ह्रदय के हर कोने में
संजों रखा है

आज भी सुरक्षित है
मेरे पास तुम्हारा लिखा
वह हर लफ्ज़
जो खतों के रूप में
कभी तुमने मुझे भेजा था

आशीर्वाद के
यह अनमोल मोती
आज भी मेरे जीवन के
दुर्गम पथ को
राह दिखाते हैं
आज भी रोशनी से यह
जगमगाते आखर और
नसीहत देती
तुम्हारी वह उक्तियाँ
मेरे पथ प्रदर्शक बन जाते हैं
और तुम्हारे साथ -साथ
चलने का
एक मीठा सा एहसास
मुझ में भर देते हैं ..

रंजना [रंजू ] भाटिया

Saturday, October 25, 2008

जीवन दायिनी, शक्तिदायिनी माँ


मै और मेरी माँ


आज धन-तेरस है, मेरी माँ का जन्म-दिवस, कहते है धन-तेरस के दिन सोना, चाँदी, रत्न आदि की खरीदारी को श्रेष्ठ माना जाता है, मेरी माँ भी एक रत्न के रूप में मेरे नाना को धन-तेरस के दिन प्राप्त हुई थी। माता-पिता की लाडली सन्तान होने के साथ-साथ मेरी माँ चार भाईयों की इकलौती बहन भी थी, नाना बड़े प्यार से उन्हे संतोष कहकर पुकारा करते थे, जैसा नाम वैसा ही गुण, खूबसूरत होने के साथ-साथ कोयली सी मीठी बोली सबको लुभाती थी।

नाना-नानी और चार भाईयों के प्यार में माँ पल कर बड़ी हुई। नटखट हिरनी सी यहाँ-वहाँ कुलाँचे भरती माँ सभी के मन को मोह लेती थी, तभी तो दादा जी उन्हे देख पोते की बहू बनाने को लालायित हो उठे थे। छोटी सी उम्र में माँ नाना का घर छोड़ एक अन्जान शहर में आ गई। लाड़ प्यार से पली माँ एक घर की बहू बन बैठी और वो भी घर की बड़ी बहू। घर में सब माँ को पाकर बहुत खुश थे। एक-एक कर मेरी दो बहन और भाई का जन्म हुआ, फ़िर मै पैदा हुई, समय जैसे पंख लगा उड़ता रहा। घर में खुशियाँ ही खुशियाँ लहरा रही थी, मेरे पिता की मै ही छोटी और लाडली बेटी थी, तभी मुझे पता चला मुझसे छोटा भी कोई आने वाला है, मेरे दादा-दादी एक बेटे की आस लगाये माँ का चेहरा निहारते रहते, हम सब की खुशी का पारावार न रहा जब मेरे छोटे भाई ने जन्म लिया।

रोमांच और खुशी से सारा घर नाच उठा मगर तभी सब पर बिजली सी गिरी एक दुर्घटना में मेरे पिता की दोनो आँखे चली गई। हम पर तो जैसे दुखों का पहाड़ टूट पड़ा। स्वाभिमान से जीने वाले मेरे पिता को हर काम के लिये किसी न किसी का सहारा लेना पड़ता था। कमाई का कोई साधन न था। किसी तरह चाचा के भेजे हुऎ पैसे ही घर की गुजर-बसर के काम आते थे। मैने अपनी माँ को पल्लू से मुँह छिपा कर कई बार रोते देखा था। नाना, मामा आ-आकर माँ को वापिस चलने के लिये कहते थे। नाना कहते थे संतोष इनके बच्चों को छोड़ और चल हमारे साथ, क्या सारी जिंदगी एक अंधे के साथ बितायेगी? अभी तेरी उम्र ही क्या है, हम तेरी दूसरी शादी कर देंगें, दर असल माँ उस समय सिर्फ़ सत्ताईस साल की थी। और उनके आगे पूरी जिंदगी पहाड़ सी खड़ी थी।

लेकिन माँ ने हिम्मत न हारी और अपने पिता को यह कह कर लौटा दिया कि यह हादसा अगर मेरे साथ या आपके अपने बेटे के साथ हो जाता तब भी क्या आप यही सलाह देते? नाना जी बेटी के सवाल का जवाब न दे पायें और उन्हे इश्वर के हवाले कर चले गये। ऎसा नही की माँ उस समय डरी नही, माँ बहुत डरी-सहमी सी रहती थी, परन्तु उन्हे मजबूत बनाने में मेरी दादी ने पूरी मदद की थी । दादी की हर डाँट-फ़टकार को माँ एक सबक की तरह लिया करती थी। पिता का नेत्रहीन होना अब उन्हे खलता नही क्योंकि पिता ने भी अपना हर काम खुद करना सीख लिया था, अब घर की कमान सम्भाली माँ के मजबूत हाथों नें। घर में ही रह कर उन्होने कपड़े सीलने, स्वेटर बनाने का काम शुरू कर दिया था। हम सब भाई-बहनों ने पढ़ाई के साथ-साथ घर का काम आपस में बाँट लिया था। मेरे पिता ने भी विपरीत परिस्थितियों में धैर्य नही खोया। माँ का हाथ बटाने की उन्होने भरसक कोशिश की।

मुझे आज भी याद है ठण्डी रोटी को गुड़ के साथ चूर कर वो हमारे लिये लड्डू बनाया करते थे। जिसे खाकर हम भाई बहन स्कूल जाया करते थे। दुनियां भर की तकलीफ़ों, रूकावटों के बावजूद माँ और बाबा ने हिम्मत नही हारी और हमें खूब पढ़ाया। इस काबिल बनाया की हम अपनी जिंदगी खुशी से बिता सकें। खुद अभावों में रहकर भी हमारे लिये सुख की कामना करने वाली वो माँ आज बहुत खुश है क्योंकि उसके दोनो बेटे आज ऊँची-ऊँची पोस्ट पर है और वो बेटियाँ जो हर पल उनकी आँखों में उम्मीद बन कर रहती थी। उनकी आँखों की रोशनी बन गई हैं।

आज भी जब कोई मुझे कहता है कि मुझमें बहुत आत्मविश्वास है, मै अपने पीछे माँ को खड़ा महसूस करती हूँ। पहले पढ़ा करते थे, अकबर और शिवाजी की तरह धरती माँ के न जाने कितने वीर-विरांगनाएं हैं जिन्हे माँ से संबल मिला है। मुझे भी मेरी माँ से ही विषम परिस्थितियों का डट कर सामना करने की प्रेरणा मिली है। माँ ने ही बताया कि कठीन परिश्रम, रिश्तों में इमानदारी बड़े से बड़े खतरों से भी हमें उबार लेती हैं। किसी रिश्ते को तोड़ना जितना आसान है निभाना उतना ही मुश्किल। माँ का होना जीवन में हर दिन धन तेरस सा लगता है। माँ वो नायाब रत्न है जिसे संजो कर वर्षों से मैने अपने दिल में सजा रखा है।

सुनीता शानू

Thursday, October 23, 2008

गोपाल

आज गोपाल याद आ रहा है।

“डाक्टर मेरे पेट में बहुत ज़ोर से दुख रहा है। देखो ना”

भोली सी उसकी शक्ल....मासूम सी आवाज़....पास ही रहता था....

क्या हुआ...??.शुरुआत में बड़ा दिल लगाकर उसे देखती, परखती....पर कुछ समझ नहीं आता।

उसकी एकटक निगाहें मुझे देखती रहती। कुछ देर बाद उसका दर्द गायब हो जाता और वह अपनी दिनचर्या सुनाने लगता।

स्कूल, दोस्त, पढ़ाई, खेल सभी के बारे में कहने के लिये इतना कुछ.....नहीं कहता तो अपने परिवार के बारे में। अक्सर देखा था...उसकी माँ,पापा,बहन.....साधारण सा ही परिवार था...आर्थिक स्थिति भी ठीक ही लगती थी.....पर कुछ तो कमी उस बच्चे में झलकती थी।

अब तो गोपाल हर रोज़ आने लगा था। मुझे भी उससे लगाव होने लगा था। मेरे साथ ही बैठ नास्ता कर लेता..... “कितने बड़े नाखून हो गये हैं...काटते क्यों नहीं ?”, मैं झिड़कती...तो वह भोलेपन से लाड़ करके कहता.... “काट दो ना!!”

उस दिन मैं व्यस्त थी...देखा था गोपाल को....उतरा सा चेहरा.....पर मुझे जाना था.....

“सिस्टर ज़रा गोपाल को देखना ” बोलकर मैं बाहर के लिये निकल गई।

लौटी तो काफी देर हो गई थी। गोपाल वहीं था। बिस्तर पर लेटा हुआ।

शरीर तप रहा था। पास गई तो मेरी तरफ सिमट गया। “इसे यहाँ क्यूँ रहने दिया है....घर भेजना चाहिये ना....इसकी माँ को कहा कि नहीं”

सिस्टर कुछ कहती उससे पहले....गोपाल के तपते हाथों ने मेरी उँगली पकड़ी...... “मैं घर नहीं जाऊँगा।
मेरे पास बैठो ना”

कब मेरी गोदी में आया और सो गया पता ही नहीं लगा। उसके पापा को पूछा था...तो कहा , “आपको तकलीफ ना हो तो रहने दो उसे।”

सो कर उठा तो तरोताजा लग रहा था.....मैने कहा..., “चलो घर जाओ माँ चिन्ता कर रही होगी....

"माँ तो भगवान के पास है...।”
मेरे चेहरे को पढ़ते हुए गोपाल बोला..., “जो घर में है....मुझे माँ नहीं लगती.....।”

“मैं जाऊँ” कहकर दरवाजे तक गया....पिर दौड़कर वापस आ गया.... “मुझे आप बहुत अच्छी लगती हैं..”,फिर भाग कर ओझल हो गया।

एक दो बार फिर आया.....फिर नहीं आया....पियोन ने बताया उनका तबादला हो गया है।

पर गोपाल अक्सर याद आ जाता है....कभी जब मेरा बेटा बीमार होता है....कभी जब माँ याद आती है...।

Wednesday, October 22, 2008

तुम्हारा प्रतिबिम्ब


हूँ मैं
तेरी ही छाया
तुम्हारे ही भावों
में ढली
तुम्हारी ही आकृति हूँ
हूँ  मैं ही तो
तुम्हारे स्नेह का अंकुर
तुम्हारे ही अंतर्मन
के रंगों से सजी
तुम्हारी  ही तस्वीर हूँ
हूँ मैं ही तो ....
तुम्हारे दिल की धडकन
तुम्हारे सासों की सरगम
इस सुनहरे संसार में
गहरे से इस सागर अपार में
तुम्हारा ही तो प्रतिबिम्ब हूँ !!


बच्चे अपने माता पिता के ही प्रतिबिम्ब होते हैं | मुझे बहुत अच्छा लगता है जब कोई कहता है मेरे पास आ कर कि मैं बिल्कुल अपने पापा की शकल की दिखायी देती हूँ ..या बहुत दिनों बाद मिलने वाला जब यह कहता है कि मेरी शकल  में मेरी माँ का अक्स दिखायी देता है ...| लगता है कहीं तो हम उनको छू पाये | अब उम्र धीरे धीरे बीत रही है..मेरी ख़ुद की बच्चियां अब बड़ी हो रही है ..और अब मिलने वाले उनको कहते हैं अरे !!आपकी बेटी तो बिल्कुल आपके कालेज टाइम मैं जैसी आप थी,वैसी दिखायी देती है ..:) समय बदलता जाता है पर कुछ लफ्ज़ शायद कभी नही बदलते ..यूँ ही पीढी दर पीढी  हम कहते चले जाते हैं | यही विचार जब दिल में उमड पड़े तो कविता में ढल गए |

रंजना [रंजू]भाटिया

Tuesday, October 21, 2008

माँ तुझे सलाम

माँ अगर भगवान् नहीं तो भगवान् से कम भी नहीं.......
कहते हैं माँ का उसके बच्चों के लिए प्यार कभी कम नहीं होता
चाहे वो जिस भी रूप में हो
माँ माँ है.................

Monday, October 20, 2008

मेरी माँ

अब आगे..........

दहेज़ में देने के लिए हाथी ही गया था

समय सुखमय चल रहा था, बाबा विनोबा भाबे का भूदान आन्दोलन जोरो पर चल रहा थाजमींदार स्वेचा से अपनी जमीं उनेह भेट कर रहे थेलेकिन बज्रपात जमिन्दरिया समाप्त कर दी गई, सीलिंग लागु हो गई

खर्चे उतने ही थे आमदनियां कम हो गईउस समय के भारत में वैसे भी उपज कम होती थी, सैकडो बीघा खेत में कुछ ही कुंतल फसल होती थी सिचाई के साधन भी सीमित थे, सुब कुछ प्रक्रति पर निर्भेर था

पहले जमींदारी के समय औरो से लगान, महसूल बसूल किया जाता थासब खत्म हो गया थाजो घोडो , हातियों से सफर करते थे वोह हल जोतने को मजबूर थेजो समय के साथ बदल गए वोह सुखी हो गये और जो बदले वोह धीरे -धीरे कंगाली की तरफ बढ़ गएउनका अतीत उनेह यह समजने नहीं देता था कि समय बदल गया है, और समय के साथ बदले तो मिट जाओगे

खैर मेरे नाना बदले और एक किसान के रूप में भी सफल हुए. लेकिन समय करवट लेता रहता हैमनुष्य रूप में जन्मे भगवान को भी कष्ट सहने पड़ते है

एक दिन खेत पर लडाई हुई, पानी को लेकर दोनों तरफों से गोली चली मेरे नाना के हाथ से दो कत्ल हो गए उनका निशाने बाज़ होना काम आयाजिदगी तो बच गई गृहस्थी उजड़ गई

नाना और बड़े मामा जेल चले गए. मुकद्दमा चला और नानाजी को उम्र कैद हो गयीएक घर बर्बाद हुआ कि उसका मरा थाऔर एक घर इसलिए बर्बाद हो गया उसके हाथ से मरादुश्मनी दोनों पक्षों को बर्बाद करती है मैंने नज़दीक से महसूस किया है .......


शेष फिर .......


मेरी माँ

अब आगे

हम आर्य है और आर्य श्रेष्ठ मनु ने कहा है "कन्याप्येंव पालनीया शिक्षा ......... । पुत्रियों का पुत्रो की समान सावधानी और ध्यान से पालन और शिक्षण होना चाहिए । लेकिन ऐसा होता कहा हैं ।

मेरी माँ का नाम रखा गया 'विजय लक्ष्मी ' । बड़े घरों की बेटियाँ स्कूल पढने नहीं जाती थी । मुश्किल से ५ वी जमात तक ही पढाई हो पाई। पर उस समय की पढाई अज की किताबी पढाई से लाख गुना बेहतर थी। और जो काम लड़किओं को जिन्दगी भर करने होते उसकी शिक्षा बखूबी सिखाई गई । और सीखी भी कढाई, बुनाई ,सिलाई और सबसे ज्यादा दुनिआदारी ।

जमींदारो के यहाँ महिलाओं को ,बेटिओं को खेत पर जाने की मनाही थी । अज भी परम्परागत परिवारों की महिलाएं यह नहीं जानती उनके खेत कहाँ पर है । सिर्फ चारदीवारी दुनिया थी उस समय ।

मेरे नाना गज़ब के शिकारी थे । ४-४ महीने जंगलो में शिकार खेलते थे । बैल गाड़ियों से रसद व कारतूस पहुचते रहते थे ,उधर से हिरन ,शेर ,चीते की खाले घर भिजवाई जाती थी । जमींदारो के शौक ने जंगली जानवर तो खत्म किये ही साथ ही अपने शौको को पूरा करने के लिए अपनी जमींदारियां भी खत्म कर दी ।

उधर माँ अपने मामा के पास से वापिस आ गई , लाड -प्यार हावी हो रहा था लेकिन नानी के कुशल निर्देशन में मेरी माँ घरेलू कामो में पारंगत हो चुकी थी । मेरे मामा जो माँ से बड़े थे उन्हें एक मास्टर घर पर पढाने आते थे । बहुत मारते थे ,लाढ़-प्यार में पले मामा की तरफदारी नाना करते थे । और मास्टर को मनाही हो गई की मार न हो । मास्टरजी ने फिर मारा उसका परिणाम यह हुआ उनकी नाक कटवा ली गई । इसके बाद पढाई से मेरी ननिहाल का नाता टूट गया । कोई मामा ज्यादा न पढ़ सका ।

नाना नानी ने अपनी बेटी के लिए दहेज सहेजना शुरू किया उस समय हाथी दहेज में देना शान की बात थी । इसलिए एक हाथी खरीदा गया ,बेटी को देने के लिए ....................

शेष आगे ...


Wednesday, October 15, 2008

संसार का सबसे मीठा शब्द ""माँ""


शब्दों का संसार रचा
हर शब्द का अर्थ नया बना
पर कोई शब्द
छू पाया
माँ शब्द की मिठास को

माँ जो है ......
संसार का सबसे मीठा शब्द
इस दुनिया को रचने वाले की
सबसे अनोखी और
आद्वितीय कृति

है यह प्यार का
गहरा सागर
जो हर लेता है
हर पीड़ा को
अपनी ही शीतलता से

इंसान तो क्या
स्वयंम विधाता
भी इसके मोह पाश से
बच पाये है
तभी तो इसकी
ममता की छांव में
सिमटने को
तरह तरह के रुप धर कर
यहाँ जन्म लेते आए हैं

रंजना [रंजू ] भाटिया

Monday, October 13, 2008

माँ को तरसता... “टुअरा”

श्री प्रमोद कुमार मिश्र बिहार के पश्चिमी चम्पारण में प्राथमिक स्तर के शिक्षक हैं। बच्चों को क, ख, ग ... की शिक्षा देने का काम है इनका, लेकिन अपने वातावरण के प्रति अत्यन्त संवेदनशील होने से इनका जीवन इस छोटे से काम को भी बड़ी गम्भीरता से करने में गुजरता है। ये अन्य शिक्षकों को प्रशिक्षित करने का दायित्व भी बखूबी निभाते हैं। श्री मिश्र ने अपनी शैक्षणिक गतिविधियों को रोचकता का नया रंग देने के लिए सांस्कृतिक कार्यक्रमों को भी इसमें शामिल करने का कारगर उपाय ढूँढ निकाला है।

दशहरे की छुट्टियों में मेरी इनसे मुलाकात हो गयी। अपने गाँव में अत्यन्त सादगी भरा जीवन गुजारते हुए इनका जीवन आधुनिक साधनों से बहुत दूर है। बात-बात में इनसे माँ के सम्बन्ध में चर्चा हुई तो भावुक हो उठे। कुरेदने पर उन्होंने एक ऐसे बच्चे की कहानी सुनायी जिसके माँ-बाप नहीं थे, बिलकुल अनाथ था, और इनके स्कूल में पढ़ने आया था। उसके दुःख पर इनके कवि हृदय से जो शब्द फूट पड़े उन्हें सुनाने लगे तो मेरा मन भी भर आया। मेरे अनुरोध पर इन्होंने इसे गाकर सुनाया तो मैने अपने मोबाइल के कैमरे को चालू कर लिया। बिना किसी साज़ के एक घरेलू बर्तन पर हाथ फेरते हुए इन्होंने जो आँखें नम कर देने वाली स्वर लहरी बिखेरी उन्हें आपके लिए सजो लाया हूँ। सुनिए:


video

आपकी सुविधा के लिए इस भोजपुरी गीत के बोल और इसका भावार्थ नीचे दे रहा हूँ।

गीत के बोल भोजपुरी में:

कवना जनम के बैर हमसे लिया गइल।
हाय रे विधाता तहरो मतिया हेरा गइल॥
()
का होला माई-बाप, हमहू ना जानी;
गोदिया के सुख का होला, कइेसे हम मानी।
जनमें से नाव मोरा, ‘टुअराधरा ग‍इल;
...........हाय रे विधाता तहरो मतिया हेरा गइल॥
()
केहू देहल माड़-भात, केहू तरकारी;
कबहू भगई पहिनी, कबहू उघारी।
एही गति बीतल मोरा, बचपन सिरा गइ;
..............हाय रे विधाता तहरो मतिया हेरा गइल॥
()
बकरी चरावत मोरा, बितलि लरिक‍इया;
केहू बाबूकहल, केहू ना ‘भ‍इया’
कहि-कहिअभागालोगवा, जियरा जरा गइ;
.............हाय रे विधाता तहरो मतिया हेरा गइल॥
()
केकरा संघे खेले जाईं, केहू ना खेलावल;
अपना में टुअरा के, केहू ना मिलावल।
रोए-रोए मनवा मोरा, अँखिया लोरा ग‍इल;
.............हाय रे विधाता तहरो मतिया हेरा ग‍इल॥
भावार्थ:
हे ईश्वर, तूने मुझे किस जन्म (के बुरे कर्म) की सजा दी है, तुम्हारा ध्यान किस ओर खो गया है?
(१) माँ-बाप क्या होते हैं, यह मैं नहीं जानता, न ही मुझे गोद के सुख का कोई पता है। मेरा तो जन्म के बाद नाम ही अनाथ (टुअरा) रख दिया गया।
(२) किसी ने (दयावश) मुझे चावल दे दिया तो किसी ने सब्जी, कभी जांघिया पहनने को मिला तो कभी नंगा ही रहना पड़ा; और इसी तरह से मेरा बचपन बीत गया।
(३) मेरा बचपन बकरी चराते हुए बीता, मुझे कभी किसी ने ‘बाबू’ या ‘भइया’ कहकर सम्बोधित नहीं किया। मुझे तो ‘अभागा’ कह-कहकर लोगों ने मेरा जी जला डाला।
(४) मैं किसके साथ खेलने जाऊँ, मुझे कोई नहीं खिलाता; इस अनाथ को अपने दल में कोई शामिल नहीं करता। इसके लिए रो-रोकर मेरी आँखें आँसू से भर गयीं हैं।

(सिद्धार्थ)

Friday, October 10, 2008

ममता की उधेड़बुन

हाथ सिलाई की मशीन देख,
आज फिर बचपन की याद आ गई...
टुक टिक टुक टिक की धुन...
फिर आ कानों में छा गई...

कितने रंगों में सजाया करती थी....
कितने सपनों को सिला करती थी...
कभी रात भर जग कर तुरपाई...
फिर कुर्सी पर लगी आँख...सोई चारपाई

तेरे सपनों में अच्छी दिखती थी...
काला ठीका लगा कर चलती थी....
तू कल के माप के सपने बुनती थी...
मैं उन्हे पहन कर हँसती थी ...

फिर एक दिन ना जाने क्या हुआ था
...समय ने कुछ इस तरह छुआ था....
तूने चलना सिखाया मैं उड़ने लगी थी...
तेरे रंगों से कतराने लगी थी....

उस दिन तू अपना सपना लेकर...
रोई थी कोने में सिसक कर...
उस दिन एक लम्बी चिट्ठी लिखी थी.......
तूने सोचा मैं सोई.......
मैं सोई नहीं थी...

रंग मेरा बहुत सुंदर नहीं था...
पल्लू पकड़ तुझसे कहा था...
मुझे भी सिखाओ सपनों को बुनना....
तेरे सपने अब नहीं है पहनना....

रात भर जग कर जो सपना बुना था...
मशीन बंद कर उसपर रखा था....
"बड़ी तू हो गई...
जा खुद ही सिलना...... "
तूने सोचा मैं गई....
मैं वहीं पर खड़ी थी .....

किताबों को पढ़कर चली कुछ बनाने....
सखी ने कहा बड़ा सुन्दर बना है...
तुझको दिया था बड़े प्यार से...
तू पहनेगी इसको इस अरमान से..
तूने उसको एक कोने में टाँगा........
तूने सोचा मैने देखा नहीं...
भरी आँख ले वहीं पर खड़ी थी....

कितने ख्वाबों को मैने बुना है....
सबने कहा खूबसूरत बना है...
तूने उसे कभी देखा ही नहीं......
शायद इसलिए कभी मुझे भाया नहीं है

अकेले एक दिन मेरे कमरे में आकर...
तह किए ख्वाबों को तू देख रही थी...
तेरे सपनों के रंगों जैसे ही थे यह...
हल्की मुस्कान थी...आंसू की चमक भी......
तूने सोचा मैं वहाँ पर नहीं थी..
तेरे आशीष के लिए तरसी रुकी थी....

आज फिर यह धुन यादों में आई....
साथ में पुराने सपने भी लाई....

बिटिया मेरे सपनों में सजी थी....
काला ठीका लगा हँस कर खड़ी थी...

कोने में कुछ भी ना टंगा था...
क्या माँ ने उसको ओढ़े रखा था ...???

Thursday, October 9, 2008

हर रूप में तेरा ही स्वरूप ..

जब ईश्वर ने दुनिया रची तो कुदरत के भेद समझाने के लिए इंसान को और नैतिक मूल्यों को विचार देने के लिए हर विचार को एक आकार दिया .यानी किसी देवी या देवता का स्वरूप चित्रित किया ..यह मूर्तियाँ मिथक थी ..पर हमारे अन्दर कैसे कैसे गुण भरे हुए हैं यह उन मूर्तियों में भर दिया ताकि एक आम इंसान उन गुणों को अपने अन्दर ही पहचान सके ...

भारत में सदियों से माता की शक्ति को दुर्गा का रूप माना जाता रहा है | एक ऐसी शक्ति का जिनकी शरण में देवता भी जाने से नही हिचकचाते हैं | शक्ति प्रतीक है उस सत्ता का जो नव जीवन देती है .जिसका माँ सवरूप सबके लिए पूजनीय है | प्रत्येक महिला वह शक्ति है वह देवी माँ हैं जिसने जन्म दिया है .अनेक पेगम्बरों को ,मसीहों को ,अवतारों को और सूफियों संतों को .....वह अपने शरीर से एक नए जीवन को जन्म देती है ..

पुराने समय में अनेक पति या पत्नी को दर्शाया जाता है .इसका गहरा अर्थ ले तो मुझे इसका मतलब यह समझ आता है कि अधिकाँश पति व पत्नी अनेक गुणों के प्रतीक हैं ...जैसे जैसे समरूपता हमें देवी देवताओं में दिखायी देती है वह हमारे ही मनुष्य जीवन के कई रूपों और कई नामों की समरूपता ही है ..

लक्ष्मी का आदि रूप पृथ्वी है कमल के फूल पर बैठी हुई देवी | यह एक द्रविड़ कल्पना थी | आर्यों ने उस को आसन से उतार कर उसका स्थान ब्रह्मा को दे दिया |पर अनेक सदियों तक आम जनता में पृथ्वी की पूजा बनी रही तो लक्ष्मी को ब्रह्मा के साथ बिठा कर वही आसान उसको फ़िर से दे दिया ...बाद में विष्णु के साथ उसको बिठा दिया .विष्णु के वामन अवतार के समय लक्ष्मी पद्मा कहलाई ,परशुराम बनने के समय वह धरणी बनी .राम के अवतार के समय सीता का रूप लिया और कृष्ण के समय राधा का ..बस यही समरूपता का आचरण है ...

इसी प्रकार ज्ञान और कला की देवी सरस्वती वैदिक काल में नदियों की देवी थी .फ़िर विष्णु की गंगा लक्ष्मी के संग एक पत्नी के रूप में आई और फ़िर ब्रहमा की वाक् शक्ति के रूप में ब्रह्मा की पत्नी बनी ..यह सब पति पत्नी बदलने का अर्थ है कि यह सब प्रतीक हुए अलग अलग शक्ति के ..

समरूपता का उदाहरण महादेवी भी हैं जो अपने पति शिव से गुस्सा हो कर अग्नि में भस्म हो गयीं और सती कहलाई ..परन्तु यह उनका एक रूप नही हैं ..वह अम्बिका है ,हेमवती ,गौरी और दुर्गा पार्वती भी .काली भी है ..काली देवी का रूप मूल रूप में अग्नि देवता की पत्नी के रूप में था फ़िर महादेवी सती के रूप में हुआ |

सरस्वती के चारों हाथों में से दो में वीणा लय और संगीत का प्रतीक है ..एक हाथ में पाण्डुलिपि का अर्थ उनकी विदुषी होने का प्रमाण है और चौथे हाथ में कमल का फूल निर्लिप्तता का प्रतीक है ..उनका वहां है हंस दूध ,पानी यानी सच और झूठ को अलग कर सकने का प्रतीक ..एक वर्णन आता है कि ब्रह्मा ने सरस्वती के एक यज के अवसर पर देर से पहुँचने के कारण गायत्री से विवाह कर लिया था ..अब इसकी गहराई में जाए तो पायेंगे की वास्तव में गायत्री से विवाह करना मतलब गायत्री मन्त्र से ,चिंतन से ,जीवन के शून्य को भरने का संकेत है ..गायत्री की मूर्ति में उसके पाँच सिर दिखाए जाते हैं यह एक से अधिक सिर मानसिक शक्ति के प्रतीक हैं ...........इसी तरह गणेश जी की पत्नियां रिद्धि सिद्धि उनकी शक्ति और बुद्धि की प्रतीक हैं

और स्त्री इन्ही सब शक्तियों से भरपूर है ..इस में भी सबसे अधिक सुंदर प्रभावशाली रूप माँ का है ...असल में जब आंतरिक शक्तियां समय पा कर बाहरी प्रतीकों के अनुसार नहीं रहती हैं तो सचमुच शक्तियों का अपमान होता है ..बात सिर्फ़ समझने की है और मानने की है ..कि कैसे हम अपने ही भीतर सत्ता और गरिमा को पहचाने क्यों कि हम ही शक्ति हैं और हम ही ख़ुद का प्रकाश ..

Tuesday, October 7, 2008

माँ !!!

जहां बचपन अपना छिपता उस पल्लू मैं,  है ये.... माँ
जहा चैन की नींद सोए..उस गोदी मै, है ये ......मा
जहा जीद करके किए है पूरे..उस अरमान मै, है ये..... माँ
जिसके गुस्से मै भी छलकता है...उस प्यार मै, है ये......माँ
जब कोई ना मिले तब रोने को..मिलते कंधे मै, है ये.....माँ
जिसकी सदा होती है..उस्स आरज़ू मै, है ये.....माँ
जिसका स्थान है सदा जहा..उस मन मै, है ये.....माँ
जहा छुपे है राज़ हमाँरे ..उस दिल मै है, ये......माँ
जिसके बिना लगे सूनापन..उस जीवन में, है ये .... माँ
जिसपे अंधा भरोसा है..वो सच्ची दोस्त, है ये .....माँ
जिसकी मौजूदगी फैलती जीवन मै..वो *खुशी*, है ये.....माँ

माँ दुर्गा की पूजा का तिहवार भला है...!!


माँ दुर्गा की पूजा का तिहवार भला है।
घर-घर में पूजा-अर्चन का दीप जला है॥
बच्चों के स्कूल बन्द, सब खिले हुए हैं।
छुट्टी औ मेला, माँ का उपहार मिला है॥

माँ की उंगली पकड़ चले माँ के मन्दिर को।
कुछ ने राह पकड़ ली नानीजी के घर को॥
गाँवों में मेला - दंगल पर दाँव चला है।
रावण का पुतला भी इसमें खूब जला है॥

मुझको भी वह दुर्लभ छाँव दिलाती माता।
शहर छोड़कर माँ के चरणों से मिल पाता॥
ममता के आँचल से लेकर मन की ऊर्जा।
नयी राह पर बढ़ने को सिद्धार्थ चला है॥

माँ दुर्गा की पूजा का तिहवार भला है।
घर-घर में पूजा-अर्चन का दीप जला है॥

(सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी)

Sunday, October 5, 2008

माँ की कामना !



काफी दिनों से माँ पर लिखने की सोच रहा था, अपनी माँ के बारे में कुछ याद ही नही मगर भावः विह्वल होकर जब भी माँ याद आती है तो एक काल्पनिक आकृति अवश्य उभरती है कि मेरी अम्मा ! भी शायद ऐसी ही होगी ! जब पहली बार डॉ मंजुलता सिंह से मिला तो यकीन नही कर पाया कि क्या कोई महिला ७० वर्ष की उम्र में, इतनी व्यस्त और कार्यशील हो सकती हैं ! डॉ मंजुलता सिंह Ph.D., जन्म १९३८ , लखनऊ यूनिवर्सिटी से गोल्ड मेडलिस्ट, ४० वर्ष शिक्षक सेवा के बाद दौलत राम कॉलेज, दिल्ली यूनिवेर्सिटी हिन्दी विभाग से, रीडर पोस्ट से रिटायर, रेकी ग्रैंड मास्टर (My Sparsh Tarang) के रूप में लोगों की सेवा में कार्यरत ! सात किताबें एवं २०० से अधिक लेख प्रकाशित हो चुके हैं, इस उम्र में भी वृद्धजनों की सेवा में कार्यरत ! ममतामयी ऐसी कि उनको छोड़कर उठने का दिल ही नही कर रहा था ! ऐसे सशक्त हस्ताक्षर की एक कविता "माँ " में प्रकाशन हेतु भेज रहा हूँ !

माँ की कामना


धरती हैं माँ ,

पृथ्वी हैं माँ

सबके पेरो के नीचे हैं माँ ।

देखती हैं , सुनती हैं , सहती हैं

कोई धीरे धीरे चलता हैं

कोई धम - धम चलता हैं

कोई थूकता है ,

कोई गाली देता हैं

कोई कूड़ा गिराता है

कोई पानी डालता हैं

सभी बच्चे हैं उसके

माँ पृथ्वी कुछ नहीं कहती

कहे भी किससे ?

और क्या कहे ?

जन्म दिया हैं जिनको

उनसे कैसे बदला ले ?

कैसे दंड दे ?

उसे तो क्षमा करना हैं ,

क्षमा - बस क्षमा वहीं उसका सुख हैं ,

वही उसकी सफलता

उसके बच्चे कही भी ,

कैसे भी जाये उसकी छाती पर चढ़ कर

बस आगे बढ़ कर यही उसकी कामना हैं ।

- डॉ मंजुलता सिंह

Tuesday, September 30, 2008

माँ के जाने के बाद

तुम तो कहती थी माँ कि..
रह नही सकती एक पल भी
लाडली मैं बिन तुम्हारे
लगता नही दिल मेरा
मुझे एक पल भी बिना निहारे
जाने कैसे जी पाऊँगी
जब तू अपने पिया के घर चली जायेगी
तेरी पाजेब की यह रुनझुन मुझे
बहुत याद आएगी .....


पर आज लगता है कि
तुम भी झूठी थी
इस दुनिया की तरह
नही तो एक पल को सोचती
यूं हमसे मुहं मोड़ जाते वक्त
तोड़ती मोह के हर बन्धन को
और जान लेती दिल की तड़प

पर क्या सच में ..
उस दूर गगन में जा कर
बसने वाले तारे कहलाते हैं
और वहाँ जगमगाने की खातिर
यूं सबको अकेला तन्हा छोड़ जाते हैं

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ढल चुकी हो तुम एक तस्वीर में माँ
पर दिल के आज भी उतनी ही करीब हो
जब भी झाँक के देखा है आंखो में तुम्हारी
एक मीठा सा एहसास बन कर आज भी
तुम जैसे मेरी गलती को सुधार देती हो
संवार देती हो आज भी मेरे पथ को
और आज भी इन झाकंती आंखों से
जैसे दिल में एक हूक सी उठ जाती है
आज भी तेरे प्यार की रौशनी
मेरे जीने का एक सहारा बन जाती है !!


रंजू

मेरे प्रथम काव्य संग्रह ""साया"' में से माँ के लिए कुछ लफ्ज़ ..