Thursday, January 8, 2009

कुछ नया लिखूँ


बचपन से आज तक की यात्रा
आहिस्ता-आहिस्ता की है पूरी
पर आज भी है मन में
एक आस है अधूरी

नहीं ढाल पाई अपने को
उस आकार में
जैसा माँ चाहती थी

माँ की मीठी यादें
उनके संग बिताए
क्षणों की स्मृतियाँ
आज हो गईं हैं धुँधली
छा गया है धुआँ
विस्मृति का

मन-मस्तिष्क पर छाए
धुएँ को हटाकर
जब झाँकती हूँ अंदर
जब उतरती हूँ
धीरे-धीरे अंतर में
तो माँ की हँसती
मुस्कुराती सलोनी सूरत
देती है प्रेरणा
करती है प्रेरित
कि कुछ नया करूँ
 समय की स्लेट पर
भावों के स्वर्णिम अक्षरों से
कुछ नया लिखूँ

पर माँ ! मन के भाव
न जाने क्यों सोए हैं
क्यों नहीं होती झंकृति
रोम-रोम में
क्यों नहीं बजती बाँसुरी
तन-मन में
क्यों नहीं सितार के तार
बजने को होते हैं व्याकुल
क्यों नहीं हाथ
बजाने को होते हैं आकुल

लगता है
तुझसे मिले संस्कार
तन्द्रा में हैं अलसाए
रिसती जा रही हैं स्मृतियाँ
घिसती जा रही है ज़िंदगी
सोते जा रहे हैं भाव

थपथपाऊँगी भावों को
जगाऊँगी उन्हें
और ले जाऊँगी
कल्पना के सागर के उस पार
जहाँ लगाकर डुबकी
लाएँगे ढूँढकर
अनगिनत काव्य-मोती

मोतियों की माला से
सजाऊँगी वैरागी मन
तब होगा नवसृजन
बजेगी चैन की बाँसुरी

पहनकर दर्द के घुँघुरू
नाचेगी जब पीड़ा
ता थेई तत् तत्
शब्दों की ढोलक
देगी थाप
ता किट धा
व्याकुलता की बजेगी
उर में झाँझ
साथ देगी
कल्पना की सारंगी
होगी अनोखी झंकार
मिलेगा आकार
मन के भावों को

माँ ! दो आशीर्वाद
कर सकूँ नवसृजन
और जब आऊँ
तुम्हारे पास
तो तुम्हें पा मुस्कुराऊँ
एक ही संकल्प

बार-बार और क्षण-क्षण
न दोहराऊँ
सभी का प्यार-दुलार
और विश्वास पाऊँ !

  • डॉ. मीना अग्रवाल

10 comments:

P.N. Subramanian said...

हृदय को झन्क्रित कर दिया "पहनकर दर्द के घुँघुरू
नाचेगी जब पीड़ा" - kitna sundar prayog. abhar.

दिनेशराय द्विवेदी Dineshrai Dwivedi said...

सुंदर, भावपूर्ण कविता!

रंजना [रंजू भाटिया] said...

बहुत सुंदर लगी यह रचना

Amit said...

बहुत अच्छी लगी आपकी ये रचना...

*KHUSHI* said...

बचपन से आज तक की यात्रा
आहिस्ता-आहिस्ता की है पूरी
पर आज भी है मन में
एक आस है अधूरी

नहीं ढाल पाई अपने को
उस आकार में
जैसा माँ चाहती थी

^ shaayad aaj bhi mai koshish kar rahi hu meri MAA jaisi ban jaau..kaash kabhi to saphalta mielgi...

ganesh vedant gupta said...

माॅ
जीवन
जीवन पथ्
जीवन दिशा
जीवन सन्देश्
है ।

माॅ

निश्छल
निर्विकार
निर्सगत
निर्स्वाथ्र्
है।
माॅ
सुख्
पथ्
दिशा
शिक्षा
है।
माॅ
रमजान का राैजा
इद का मिलाद
मुहर्रम की श्हादत
अल्लाह की इबादत
हेे।
माॅ
मीठी
याद,
स्मर्ति
डाॅट
है
माॅ
सदमार्ग की सरिता
गु णाे की ख्।न
जीवन रक्षा कवच
ममता की सरगम
हे।
माॅ
तपन मै ठडक
बरसात मै छतरी
जाडै मै शाााल
रेगिस्तान मे जल है .
माॅ
प्यार की थ्पकी
स्नेह की बाती
लाड की डै।री
दुलार की लै।री
है ।
माॅ
कबीर की वाणीीीी
साइ की सीख्
गाॅघीी की अहिसा
नानक का सदैश्
इसा की रै।श्नी
महावीर की दीक्षा
है ।
माॅ
बलि दान की पन्नाधाय
वात्सल्य की यशाैैदा

जीवन कीी विश्व्।कर्मा
शििक्षाा की कुबैर
वीरता की दुर्गा
त्याग् कीी सीीताा
पेर्र्र्म कीी मीीरा

ganesh vedant gupta said...

माॅ
जीवन
जीवन पथ्
जीवन दिशा
जीवन सन्देश्
है ।

माॅ

निश्छल
निर्विकार
निर्सगत
निर्स्वाथ्र्
है।
माॅ
सुख्
पथ्
दिशा
शिक्षा
है।
माॅ
रमजान का राैजा
इद का मिलाद
मुहर्रम की श्हादत
अल्लाह की इबादत
हेे।
माॅ
मीठी
याद,
स्मर्ति
डाॅट
है
माॅ
सदमार्ग की सरिता
गु णाे की ख्।न
जीवन रक्षा कवच
ममता की सरगम
हे।
माॅ
तपन मै ठडक
बरसात मै छतरी
जाडै मै शाााल
रेगिस्तान मे जल है .
माॅ
प्यार की थ्पकी
स्नेह की बाती
लाड की डै।री
दुलार की लै।री
है ।
माॅ
कबीर की वाणीीीी
साइ की सीख्
गाॅघीी की अहिसा
नानक का सदैश्
इसा की रै।श्नी
महावीर की दीक्षा
है ।
माॅ
बलि दान की पन्नाधाय
वात्सल्य की यशाैैदा

जीवन कीी विश्व्।कर्मा
शििक्षाा की कुबैर
वीरता की दुर्गा
त्याग् कीी सीीताा
पेर्र्र्म कीी मीीरा

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक said...

माँ नही होती तो दुनियाँ में,
बालक कैसे आते?
माता यदि न पालन करती,
प्यार कहाँ से पाते?
माता की महिमा अनन्त है।
आदि न उसका,नही अन्त है।

Shikha (MahiYa) said...

Bahut khoobsurat aur bhaavpuran rachna..

amit said...

Bahut Khub..
Me koi kavi to nahi..
Par aapke piroe hue sabd mere man ko jhanjkor gaye.
Mujhe merei maa ki yaad dila gaye.

Maa.. Jis sabd me saari shristi samayi he.

Maa.. Sirf Srijankarta.

Maa.. Ek Anaadi, jo suru to karti he, par khatma kabhi nahi.

Maa.. Ma aur aaa.. Jo Ma - Mein / Khud aur aaa - aahe bharti he. Bina kabhi uuf tak kiye.

Dhanya ho Maa.