Wednesday, October 22, 2008

तुम्हारा प्रतिबिम्ब


हूँ मैं
तेरी ही छाया
तुम्हारे ही भावों
में ढली
तुम्हारी ही आकृति हूँ
हूँ  मैं ही तो
तुम्हारे स्नेह का अंकुर
तुम्हारे ही अंतर्मन
के रंगों से सजी
तुम्हारी  ही तस्वीर हूँ
हूँ मैं ही तो ....
तुम्हारे दिल की धडकन
तुम्हारे सासों की सरगम
इस सुनहरे संसार में
गहरे से इस सागर अपार में
तुम्हारा ही तो प्रतिबिम्ब हूँ !!


बच्चे अपने माता पिता के ही प्रतिबिम्ब होते हैं | मुझे बहुत अच्छा लगता है जब कोई कहता है मेरे पास आ कर कि मैं बिल्कुल अपने पापा की शकल की दिखायी देती हूँ ..या बहुत दिनों बाद मिलने वाला जब यह कहता है कि मेरी शकल  में मेरी माँ का अक्स दिखायी देता है ...| लगता है कहीं तो हम उनको छू पाये | अब उम्र धीरे धीरे बीत रही है..मेरी ख़ुद की बच्चियां अब बड़ी हो रही है ..और अब मिलने वाले उनको कहते हैं अरे !!आपकी बेटी तो बिल्कुल आपके कालेज टाइम मैं जैसी आप थी,वैसी दिखायी देती है ..:) समय बदलता जाता है पर कुछ लफ्ज़ शायद कभी नही बदलते ..यूँ ही पीढी दर पीढी  हम कहते चले जाते हैं | यही विचार जब दिल में उमड पड़े तो कविता में ढल गए |

रंजना [रंजू]भाटिया

12 comments:

ग़ुस्ताख़ said...

पैसे से सबकुछ मिल सकता है मां नहीं मिल सकती। दुनिया का सबसे बड़ा सच ये है कि मां आपकी मां है। सबसे बड़ा विश्वास ये है पिता आपके पिता हैँ।

रंजना said...

वाह ! वाह ! और सिर्फ़ वाह !
एकदम सही कहा आपने.

मनुज मेहता said...

हूँ मैं
तेरी ही छाया
तुम्हारे ही भावों
में ढली
तुम्हारी ही आकृति हूँ
हूँ मैं ही तो
तुम्हारे स्नेह का अंकुर
तुम्हारे ही अंतर्मन
के रंगों से सजी
तुम्हारी ही तस्वीर हूँ
हूँ मैं ही तो ....
तुम्हारे दिल की धडकन
तुम्हारे सासों की सरगम
इस सुनहरे संसार में
गहरे से इस सागर अपार में
तुम्हारा ही तो प्रतिबिम्ब हूँ !!

wah ranjana ji bahut khoob
shaandaar

सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी said...

हम पति-पत्नी के बीच अक्सर यह कम्प्टीशन होता है कि हमारे बच्चे दोनों में किस पर गये हैं।

घर आने वाले हर नये व्यक्ति से यह प्रश्न मेरी पत्नी पूछती हैं कि बेटा किस पर गया है...।

अब इस निष्कर्ष पर सहमति बन गयी है कि बेटी मेरी जैसी और बेटा अपनी माँ जैसा है।:)

*KHUSHI* said...

mai aaine mai aksar dekh ke sochti hu kimai meri maa jaisi kitne % dikhai deti hu.. kamse kam unke jaisa zindagi jine ka hausla mile.. unke jaisa aatmavishwaas se jine sikh lu. to samjungi ki mai sach mai meri ma ki pratibimb hu..

ranju ji... bahut hi sundar rachana

makrand said...

इस सुनहरे संसार में
गहरे से इस सागर अपार में
तुम्हारा ही तो प्रतिबिम्ब हूँ !!

bahut accha kavita
regards

मोहिन्दर कुमार said...

भावों की सुन्दर अभिव्यक्ति...

Manvinder said...

bahut achcha likha hai RANJU

vandana said...

hum apni ma ke pratibib aur hamare bachche hamare pratibib..............kya anootha rishta hai ye.......koi bhi isse achuta nhi.......aur isi pratibimb mein sab kucch simat sa gaya ho jaise
waah!kya khoob likha hai aapne

Mrs. Asha Joglekar said...

वाह रंजू जी बहत सही बात को कितने कोमल शब्दों में व्यक्त किया है । बधाई ।

nitu said...

bahut khoob exilent
maa par chand sabd meri taraf se....
maa tum bahut satati ho
jab bhi aati ho sapno me
bahut rulati ho..
kahaan chali gayi chor ke mughko
kaise tera deedar karoon
kahaan milega ab wo aanchal
ji bhar jisme pyar karoon

nitu said...

bahut khoob exilent
maa par chand sabd meri taraf se....
maa tum bahut satati ho
jab bhi aati ho sapno me
bahut rulati ho..
kahaan chali gayi chor ke mughko
kaise tera deedar karoon
kahaan milega ab wo aanchal
ji bhar jisme pyar karoon