Tuesday, September 30, 2008

माँ के जाने के बाद

तुम तो कहती थी माँ कि..
रह नही सकती एक पल भी
लाडली मैं बिन तुम्हारे
लगता नही दिल मेरा
मुझे एक पल भी बिना निहारे
जाने कैसे जी पाऊँगी
जब तू अपने पिया के घर चली जायेगी
तेरी पाजेब की यह रुनझुन मुझे
बहुत याद आएगी .....


पर आज लगता है कि
तुम भी झूठी थी
इस दुनिया की तरह
नही तो एक पल को सोचती
यूं हमसे मुहं मोड़ जाते वक्त
तोड़ती मोह के हर बन्धन को
और जान लेती दिल की तड़प

पर क्या सच में ..
उस दूर गगन में जा कर
बसने वाले तारे कहलाते हैं
और वहाँ जगमगाने की खातिर
यूं सबको अकेला तन्हा छोड़ जाते हैं

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ढल चुकी हो तुम एक तस्वीर में माँ
पर दिल के आज भी उतनी ही करीब हो
जब भी झाँक के देखा है आंखो में तुम्हारी
एक मीठा सा एहसास बन कर आज भी
तुम जैसे मेरी गलती को सुधार देती हो
संवार देती हो आज भी मेरे पथ को
और आज भी इन झाकंती आंखों से
जैसे दिल में एक हूक सी उठ जाती है
आज भी तेरे प्यार की रौशनी
मेरे जीने का एक सहारा बन जाती है !!


रंजू

मेरे प्रथम काव्य संग्रह ""साया"' में से माँ के लिए कुछ लफ्ज़ ..

5 comments:

seema gupta said...

और आज भी इन झाकंती आंखों से
जैसे दिल में एक हूक सी उठ जाती है
आज भी तेरे प्यार की रौशनी
मेरे जीने का एक सहारा बन जाती है !!
" i am reading your book, and your creations are commendable, each poem has so deep touching feeling, the poetry on 'ma' is really written from soul not from heart, each word has touched my heart'

regards

mamta said...

इसे पढ़कर आँखें नम हो आई ।
वैसे कहने की जरुरत नही है आपने बहुत ही सुंदर लिखा है ।

मोहन वशिष्‍ठ said...

सच में बहुत ही अच्‍छा लिखा है आपने

*KHUSHI* said...

Ranju ji apane hame rula diya...
jaise dil ki baate aapne padh li aur yaha bayaan kar di..
hum aapki kalam ke fan ho gaye....

कुन्नू सिंह said...

रूलाने वाला लेख है।
ईसे पढ कर कोई भी पीघल जाएगा।

बहुत बहुत बहुत.....अच्छा लीखे हैं।