Thursday, September 18, 2008

माँ चिट्ठे की चिट्ठानीति!

हजारों साल से "माँ" मानव समाज की मुख्य धुरी रही है, लेकिन अधिकतर समूहों ने पलट कर माँ को न तो धन्यवाद दिया, न आभार माना. लेकिन चुने हुए कुछ मातृसत्तात्मक समूहों में स्थिति भिन्न रही पर जनसंख्या के हिसाब से ऐसे समाज नगण्य रहे.  कुल मिला कर कहा जाये तो मानव समाज से माँ को जो कुछ मिलना चाहिये वह कम ही मिला है.

माँ चिट्ठे की स्थापना इसलिये हुई कि चिट्ठाकार एक जगह आकार अपने जीवन में अपनी माँ के रोल के बारे में, एवं समाज में माँएं क्या कर रही हैं इसके बारे में लोगों को बताये. आभार जताने का एक अच्छा तरीका होगा यह. इतना ही नहीं, हम सब एक दूसरे को यह भी बता सकते हैं कि हम सब से कहां कहां चूक हुई है एवं उसके लिये क्या किया जा सकता है.

इस चिट्ठे पर हर चिट्ठाकार का स्वागत है जो इस विषय पर लिखना चाहता है या चाहती है. यदि आप एक नोट Admin.Mataashri@gmail.com पर भेज दें तो तुरंत आपको एक "इन्वाईट" भेज दिया जायगा. जैसे ही आप उसे स्वीकार कर लेंगे, वैसे ही आप को इस चिट्ठे पर पोस्ट करने का अधिकार मिल जायगा.

माँ विषय पर आप कोई भी प्रेरणात्मक या मार्गदर्शी बात लिख सकते है. यह विषय बहुत विशाल है एवं हम आपकी सकारात्मक अभिव्यक्ति पर किसी तरह की पाबंदी नहीं लगायेंगे. आप चाहे तो अपनी मां की पूरी जीवन सचित्र यहां पोस्ट कर सकते हैं. आप चाहें तो किसी और माँ के बारे में लिख सकते है.

सिर्फ एक पाबंदी है -- आलेखों एवं टिप्पणियों का उपयोग व्यक्तिविमर्श, चरित्रहनन, पुरूषविरोध/स्त्रीविरोध, राष्ट्रविरोध, या धर्मविरोध आदि के लिये नहीं होना चाहिये. ऐसे आलेख/टिप्पणियां तुरंत हटा दी जायेंगी. लेकिन विषयविमर्श की आजादी होगी, बौद्धिक विषयों की चर्चा की सीमाओं के भीतर. मतांतर होने पर विषय के बारे में लिखें, लेखक के बारे में नहीं. ऐसा कर हम जितना अधिक मतैक्य पा सकेंगे उतना करने की कोशिश करेंगे.

आईये, माँ चिट्ठे से जुड जाईये एवं अपना आदर रेखांकित करें -- चिट्ठा नियंत्रक !!

4 comments:

Ranjeet said...

"माँ" शब्द सुने या बोले मन मे एक ही तरह की भावना आती है सम्मान की, किसी ने ठिक ही कहा है भगवान सभी जगह नही रह सकते इसलिए उन्होने माँ को बनाया. महोदय माँ के उपर कुछ भी लिखना, मेरे हिसाब से असम्भव है.

RAJ SINH said...

namaskar shastriji,

ichcha to thi yah 'maa' chitthe me ho par pata naheen yah aap dvara nirupit dikdarshanon pe kari hai aur koyi virodh to naheen ? aap yadi uchit samajhen.

RAJ SINH said...

yah to batana rah gaya: mere kahane ka arth mere chitthe rajsinhasan....say par 'maan' alekh se tha.

*KHUSHI* said...

hame iss maa ke vishw ka hissadaar banane kel iye hsukriya shashrtiji...