Friday, September 19, 2008

तेरी ममता जीवनदायी …माई ओ माई …

पिछले वर्ष इलाहाबाद में स्थानान्तरण से आने के बाद मेरे घर में पहली बार कम्प्यूटर आया, ...तत्काल इन्टरनेट लगा और अब ....ब्लॉग जगत में प्रवेश करने के बाद तो जिन्दगी ही बदल गयी है। पहले सत्यार्थमित्र, फिर हिन्दुस्तानी एकेडेमी और अबमाँ’; लगता है जैसे यह सब सपना है। ...लेकिन की-बोर्ड की खटर-पटर आश्वस्त करती है कि मैं जाग्रत अवस्था में हूँ। शास्त्री जी ‘सारथी’ का सानिध्य और उत्साहबर्द्धन तो अमूल्य है।

अपनी माँ के बारे में क्या लिखूँ... जब ०६ वर्ष का था, तभी पेशे से अध्यापक पिता ने गाँव से हटाकर निकट के कस्बे में हम सभी भाई-बहनों को एक शिशु मन्दिर में पढ़ने के लिए किराये के कमरे में स्थापित कर दिया। उनमें मैं सबसे छोटा था और सबसे बड़े भाई थे ११ साल के। हम तभी से स्वपाकी हो गये।

सप्ताहान्त पर गाँव जाना होता तो माँ दरवाजे पर ही प्रतीक्षा करती मिल जातीं ...शनिवार की शाम से लेकर सोमवार की सुबह सात-आठ बजे तक का समय ही के हिस्से में होता, जो हमारे गन्दे कपड़ों की सफाई, सरसो के उबटन से साप्ताहिक मालिश, चार भाई-बहनों के बीच सप्ताह भर में हुए विभिन्न झगड़ों के निपटारे और आगामी सप्ताह के लिए भोज्य पदार्थों और ‘नसीहतों’ की पोटली बाँधने में बीत जाती। ...यही समय हमारे लिए स्पेशल डिश खाने का भी होता जिसे बनाने में उन्हें विशेष महारत हासिल थी।


‘हाई स्कूलमें आकर हम और दूर हो गए। माँ का सानिध्य साप्ताहिक से बढ़कर मासिक या इससे भी लम्बा होता गया। फिर इलाहाबाद विश्वविद्यालय में प्रवेश लेने के बाद तो हम वार्षिक त्यौहारों में ही के आँचल की छाँव पा सकते थे। उस जमाने में गाँव पर टेलीफोन या बिजली भी नहीं थी। चिठ्ठियों से हाल-चाल मिला करता था। फिर नौकरी मिली तो भी माँ को अपने पास स्थायी रूप से नहीं बुला सका। बड़े से संयुक्त परिवार में सबसे बड़ी होने के नाते वह गाँव नहीं छोड़ सकीं।


इलाहाबाद ने मुझे उनकी सेवा का अवसर भी दिया है। मेरा बेटा जब दिसम्बर में एक साल का हुआ तो उस अवसर पर आने का मेरा आग्रह वे टाल नहीं सकीं। उसके बाद यहाँ के माघ-मेले का लोभ-संवरण वे खुद ही नहीं कर पायीं। यहाँ करीब महीने भर का दुर्लभ सानिध्य हमें बहुत सुख दे गया।


...इसी अवसर पर त्रिवेणी महोत्सव का भव्य आयोजन हुआ था। यहाँ का ‘कवि सम्मेलन’ और ‘मुशायरा’ उत्कृष्ट था। मैने वहाँ जब ताहिर फ़राज के कण्ठ से इस गीत को अत्यन्त भावुक स्वर में सुना तो अनायास मेरी आँखें भर आयीं…। …मैने क्या-क्या नहीं गवाँ दिया इस जीवन में माँ से दूर रहकर।


आप भी इन पंक्तियों को पढ़िएमुझे विश्वास है कि आप भी वैसा ही कुछ महसूस करेंगे..

अम्बर की ऊँचाई, सागर की ये गहराई

तेरे मन में है समाईमाई ओ माई

तेरा मन अमृत का प्याला, यहीं क़ाबा यहीं शिवाला

तेरी ममता जीवनदायी माई ओ माई


जी चाहे क्यूँ तेरे साथ रहूँ मैं बन के तेरा हमजोली

तेरे हाथ न आऊँ छुप जाऊँ, यूँ खेलूँ आँख मिचौली

परियों की कहानी सुनाके, कोई मीठी लोरी गाके

करदे सपने सुखदायीमाई ओ माई।


संसार के ताने-बाने से घबराता है मन मेरा

इन झूठे रिश्ते नातों में, बस प्यार है सच्चा तेरा

सब दुख सुख में ढल जाएँ, तेरी बाहें जो मिल जाए

मिल जाए मुझे खुदाईमाई ओ माई


जाड़े की ठण्डी रातों में जब देर से घर मै आऊँ

हल्की सी दस्तक पर अपनी तुझे जागता हुआ मैं पाऊँ

र्दी से ठिठुरती जाए, ठण्डा बिस्तर अपना

मुझे दे दे गरम रजाईमाई ओ माई


फ़िर कोई शरारत हो मुझसे नाराज करूँ मै तुझको

फ़िर गाल पे थप्पी मार के तू सीने से लगा ले मुझको

बचपन की प्यास बुझादे अपने हाँथों से खिलादे

पल्लू में बँधी मिठाई…..माई ओ माई

डबडबाई आँखों से मैने गीत के ये बोल मद्धिम रोशनी में कागज पर उतारे थे। ताहिर फ़राज साहब को सलाम करते हुए इन्हें यहाँ दे रहा हूँ। कोई शब्द बदल गया हो तो जरुर बताएं।
(सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी)

19 comments:

दिनेशराय द्विवेदी said...

त्रिपाठी जी, आप की संवेदनाएँ इस आलेख में प्रकट हुई। लेकिन माँ के बारे में इस से कुछ भी पता नहीं लगा। कैसा था उन का जीवन। किन भावों और अभाव में जिया।

सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी said...

द्विवेदी जी, इसके लिए थोड़ी प्रतीक्षा किजिए। अपनी माँ के जीवन के बारे में बहुत जल्दबाजी में नहीं लिख सकता। आगे कोशिश जरूर करूंगा। बहुत सी बातें बतानी हैं।

Shastri said...

सिद्धार्थ जी, आपके लेख ने दिल हर लिया. अंत में जो कविता दी है उसको पढते पढते अश्रु प्रवाह होने लगा! अभार! आभार!!!


-- शास्त्री

-- ऐसा कोई व्यक्ति नहीं है जिसने अपने विकास के लिये अन्य लोगों की मदद न पाई हो, अत: कृपया रोज कम से कम 10 हिन्दी चिट्ठों पर टिप्पणी कर अन्य चिट्ठाकारों को जरूर प्रोत्साहित करें!! (सारथी: http://www.Sarathi.info)

रंजना [रंजू भाटिया] said...

बहुत अच्छा लिखा है आपने ...कविता ने भावुक कर दिया . शुक्रिया

sab kuch hanny- hanny said...

जाड़े की ठण्डी रातों में जब देर से घर मै आऊँ

हल्की सी दस्तक पर अपनी तुझे जागता हुआ मैं पाऊँ

सर्दी से ठिठुरती जाए, ठण्डा बिस्तर अपनाए।

मुझे दे दे गरम रजाई …माई ओ माई।

sahi baat hai maa ki mamta yaad aati hai

makrand said...

respected sir
how can i connect to chittha jagt
u got mindblowing word power
thanks

makrand said...

respected sir
how can i connect to chittha jagt
u got mindblowing word power
thanks

योगेन्द्र मौदगिल said...

वाह क्या प्रस्तुति है आपकी....
संवेदनशील..

योगेन्द्र मौदगिल said...

वाह क्या प्रस्तुति है आपकी....
संवेदनशील..

dhiru singh said...

ishwar ko kisi ne nahi dekha lekin ma ki roop main vh hamare saath hamesha rahta hai .aisa mahsoos karta hoon.aur ma kya hoti hai uska pata tab chalta hai jab voh hamesha ki liya chali jaati hai.aaj hi ke din meri ma muj se bahut dur chali gai.

anitakumar said...

हम इस लेख में आप की पीड़ा के साथ साथ उस मां की पीड़ा देख सकते हैं जिसने अपने बच्चों को बड़ा होते टुकड़ो टुकड़ों में देखा ( हफ़्ते के दो दिन) ये दुख गांव की मांओं का नितान्त निजि दुख है जो शहर की महिलाओं को शायद नहीं भोगना पड़ता। आगे के लेखों का इंतजार रहेगा

परमजीत बाली said...

बहुत संवेदना से भरा लेख लिखा है।

Udan Tashtari said...

ताहिर साहब की आवाज में ही यह गीत सुना था..आँख भर आती है, बहुत उम्दा लिखा है आपने.

श्यामल सुमन said...

सिद्धार्थ जी,

उस ममता की मूरत, जिसे हम माँ कहते हैं, के बारे में जितना भी कहा जाय कम है। सचमुच माँ अनमोल होती है। माँ के बारे लिखते लिखते रचनाकारों की कलम थकती नहीं और न थकेगी। मुझे मुनव्वर राणा साहब की पंक्तियाँ याद आ रही है-

मेरे गुनाहों को इस कदर धो देती है।
माँ जब गुस्सा में हो तो रो देती है।।

अच्छी प्रस्तुति। भावपूर्ण रचना। बधाई। शुभकामनाएँ।
सादर
श्यामल सुमन
09955373288
मुश्किलों से भागने की अपनी फितरत है नहीं।
कोशिशें गर दिल से हो तो जल उठेगी खुद शमां।।
www.manoramsuman.blogspot.com

प्रदीप मानोरिया said...

जाड़े की ठण्डी रातों में जब देर से घर मै आऊँ
हल्की
सी दस्तक पर अपनी तुझे जागता हुआ मैं पाऊँ
सर्दी से ठिठुरती जाए, ठण्डा बिस्तर अपनाए।
मुझे दे दे गरम रजाई …माई ओ माई
बहुत बढिया और सटीक लेखन ब्लोग जगत में आपका स्वागत है निरंतरता की चाहत है
फुर्सत हो तो मेरे ब्लॉग पर भी दस्तक दें

लोकेश said...

परियों की कहानी सुनाके, कोई मीठी लोरी गाके
करदे सपने सुखदायी…


इन पंक्तियों ने कितनी ही यादों के द्वार खोल दिये।

अच्छी प्रस्तुति, बधाई।
शुभकामनाएँ।

राजेंद्र माहेश्वरी said...

माता की ममता एक सॉचे की तरह हैं, जिसमें वह अपने मन के अनुरुप अपनी सन्तान का निर्माण करती है।

shama said...

aa hun...kaash koyee mujhpe bhee aisee kavitaa likh de!!
Shama

Mrs. Asha Joglekar said...

Tripathiji pahale to roman me likhane ke liye kshama prarthi hoon. Aapka lekah aur kawita dono abhibhoot kar gaye. Bhawbheeni rachana.