Monday, September 22, 2008

आजकल की माताएँ

alexandralee हमारे जमाने क़ी माओं और आज क़ी माओं में मैने बहुत बड़ा अंतर पाया है. पहले अपने यहाँ संयुक्त परिवारों क़ी व्यवस्था थी. एकल परिवार बिरले थे. संयुक्त परिवार में बच्चे एक उन्मुक्त वातावरण में पलते हैं. घर गृहस्थी के अतिरिक्त माओं पर बच्चों से संबंधित दायित्व उतना ज़्यादा नहीं था जितना आज है. परिवार में दायित्व बहुओं में बँटा रहता था. मैं स्कूल में क्या करता हूँ, क्या पढ़ता हूँ, होमवर्क क्या है आदि क़ी मेरी मां ने कभी सुध नहीं ली. ले भी कैसे, बच्चों क़ी तो लाइन लगी थी. किस बच्चे की सोचे. या ये कहें कि ज़रूरत ही नहीं थी. भगवान ने दिया है तो सब वही संभालेगा. परीक्षा में ९८% अंक प्राप्ति क़ी कल्पना किसी ने क़ी थी क्या? लेकिन आज का परिदृश्य?

मैं रोज देखता हूँ, हर रोज सुबह होते ही, बच्चों को तय्यार करा कर हाथ पकड़ कर ले जाते हुए. स्कूल बस में चढ़ाने. बस्ते का बोझ भी मां ही ढोती है. बच्चों क़ी वापसी के समय पुनः माताएँ सड़क के किनारे खड़ी इंतज़ार करती रहती हैं. बच्चों के आने पर बस्ते को स्वयं कंधे पर लटका कर, घर लाती हैं. बच्चा नाचता गाता इठलाता हुआ आगे आगे चलता है, मां पीछे पीछे. बच्चे के घर पहुँचते ही शुरू हो जाता है, कल के होम वर्क क़ी खोज खबर.

कल ही क़ी बात है. एक दूसरे शहर मे पदस्थ अपने भाई से बात क़ी. बहू के बारे में पूछा. पता चला कि वह अचानक बेटे से मिलने कोडैकनाल अकेले ही चली गयी है. बार बार के तबादलों और बच्चों कि पढ़ाई पर उसके दुष्प्रभाव को ध्यान मे रख कर इसी साल मेरे एक भतीजे को वहाँ क़ी बोर्डिंग स्कूल में भर्ती कराया गया था. वहाँ ठंड कुछ ज़्यादा ही पड रही है और गरम कपड़े उसके पास उतने नहीं थे जितने क़ी ज़रूरत है. अपने इस बेटे के लिए गरम कपड़े लेकर गयी है. वहाँ यह भी देखेगी क़ी उसकी पढ़ाई कैसे चल रही है. सभी कापियों क़ी जाँच भी करेगी. उसका बस चलता तो बेटे के साथ साथ खुद भी होस्टल में ही रहती. एक दूसरा बेटा पास ही दूसरे शहर में इंजनीरिंग के अंतिम पड़ाव में है. पिछले सेमिस्टेर में दो विषयों में कम नंबर मिले. इस बात का टेन्षन भी है. इसलिए उसके पास जाना भी ज़रूरी है.

मेरा एक दूसरा भाई (हम अनेक हैं) कनाडा में पदस्थ था, चार साल के लिए. दो बच्चियाँ है. बड़ी हुनरमंद. वहाँ क़ी पढ़ाई मस्ती भरी होती है. बहू ने भारतीय सीबीएससी क़ी किताबें मंगवाली. बच्चों को स्कूल से आने के बाद इन किताबों को पढ़ना पड़ता था. इस का फ़ायदा यह हुआ कि उनके वापस आने के बाद यहाँ पढ़ाई जारी रखने में कोई दिक्कत नहीं हुई. १० वीं में छोटी को ९४.५% अंक मिले. माता अप्रसन्न थी. उसने बेटी से पूछा - बचे हुए ५.५ किसे दे आई. बड़ी वाली इंजनीरिंग कर रही है और कॉलेज में हमेशा अव्वल.

लगता है कि विश्व में बौद्धिक संपदा पर भारतीय एकाधिकार का मार्ग प्रशस्त करने में हमारी माताओं की अहम भूमिका रहेगी.
 
आलेख: पी एन सुब्रमनियन । चित्र by alexandralee

6 comments:

Shastri said...

"लगता है कि विश्व में बौद्धिक संपदा पर भारतीय एकाधिकार का मार्ग प्रशस्त करने में हमारी माताओं की अहम भूमिका रहेगी."

वाह, क्या बात कही है आप ने. सच, इस नजरिये से तो आधुनिक माँ के कार्य को कभी नहीं देखा, लेकिन सच है कि दुनिंयाँ पर राज करने में भारतीया माँओं का रोल बहुत अधिक है!!

-- शास्त्री

हिन्दी ही हिन्दुस्तान को एक सूत्र में पिरो सकती है
http://www.Sarathi.info

सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी said...

बच्चों की प्रारम्भिक शिक्षा पूरी तरह माँ पर निर्भर होती जा रही है। अच्छी बात ये है कि माताएं अपनी इस जिम्मेदारी को बखूबी समझ भी रहीं हैं, और इसके अच्छे परिणाम भी आ रहे हैं।

आपका लेख बहुत सामयिक है। आभार।

Mrs. Asha Joglekar said...

बहुत सही और सटीक बात कही है आपने । आजकल की माँएं वैसे दुर्गा का ही प्रतिरूप हैं दसियों मोर्चों पर सम्हाल ती रहती हैं और हर जगह अच्छे से अच्छा करने की कोशिश ।

दिनेशराय द्विवेदी said...

जहाँ बच्चों की जिम्मेदारी माताएँ संभाल लेती हैं वहाँ उन के भविष्य को उज्जवल होने से कोई नहीं रोक सकता।

राष्ट्रप्रेमी said...

निश्चित रूप से वर्तमान में मां पर गुरुतर दायित्व है. किन्तु अंको के पीछे भागना ही शिक्षा की चरम परिणति नहीं.

Truth Eternal said...

mataein sach mein apne bachchon ki shiksha ko gambhirta se le rahin hain ...
par Rashtra premi ki baat sahi hai....
ankon ke peechhe na bhagen...
kahin aisa na ho ki hamari adhoori ichchhaon aur mahatvakankshaon ka bojh unke bachpan ko kuchal dale....