Thursday, September 18, 2008

मेरे पास माँ नहीं है!!!

मेरी माँ अब इस संसार मे नहीं हैं- 1 दिसंबर (मंगलवार) 1998 को लखनऊ के संजय गाँधी पीजीआई अस्पताल के नैफ्रोलॉजी विभाग के आईसी यू में उन्होने तकरीबन दिन के पौने बारह बजे आखिरी सांस ली थी- आज भी मुझे वो वक्त ठीक ऐसे याद है जैसे अभी अभी वही दृश्य मेरे सामने से निकला हो- माँ का जाना कितना दुखद होता है ये शायद माँ के जाने के बाद ही पता चलता है क्योकि जब तक वो आपके साथ होती है आप उसके जाने के बारे मे कभी सोच भी नही सकते और इसीलिए उसका जाना किसी भी बड़े सदमे से भी भयानक और सहमा देने वाला होता है।

अब माँ तो चली गई और रह गये आप- बिल्कुल अकेले क्योकि वो प्यार-दुलार, ममता और कोई दूसरा आपको चाहकर भी न तो दे सकता है और ना ही आप उससे ले सकते है। एक शून्य जैसा एहसास होने लगता है आसपास- जैसे कि आप अभी तक एक खोल मे सिमटे पड़े थे और अचानक आपको किसी ने छिलके से बाहर निकाल दिया हो। मेरे साथ भी कुछ ऐसा ही हुआ- समझ नही आ रहा था कि अब कंहा से शुरू करू अपनी जिंदगी को जैसे अचानक तेज रफ्तार से भागती ट्रेन से किसी ने फेंककर मुकाबले के लिए ललकारा हो- कि आ अब रेस कर निकल आगे अगर निकल सकता है तो ।

मेरी माँ करीब पाँच साल से बीमार तो थी लेकिन पलंग पर पड़े पड़े वो हिम्मत देती रहती थी- मानो कह रही हो कि बेटा मैं हूँ ना- और अगर ना भी कहती तो हिम्मत सी बंधी रहती थी और इसी हिम्मत के बल पर मैंने कितनी ही पहाड़ जैसी मुश्किलो को पार कर लिया था ये मैं ही जानता था- लेकिन अब माँ के जाने के बाद वो हिम्मत टूटने सी लगी थी- और हिम्मत से हारा आदमी हर जगह मात खाता है ये तो सब जानते है।

आज माँ को मुझसे दूर गये करीब दस बरस होने को आये लेकिन ये सारी बाते आज भी मुझे अकेलेपन का एहसास करा जाती है- सच है माँ की तुलना में तो प किसी को भी खड़ा नहीं कर सकते- माँ तो वाकई महान होती है लेकिन ये बात अगर माँ के साथ रहते समझ आ जाये तो कहने ही क्या।
आज भी जब मैं किसी को अपनी माँ से बदतमीजी से बात करते देखता हूँ तो सोचता हूँ कि वाकई ये निर्लज्ज नहीं जानता कि ये कितनी बड़ी मूर्खता कर रहा है ये नहीं जानता कि इसके पास क्या है और वो उसके साथ क्या कर रहा है।

अमिताभ बच्चन की फिल्म दीवार जब बचपन मे माँ की बगल मे बैठकर दूरदर्शन पर देखी थी तब शशि कपूर के उस डायलॉग का मतलब समझ नहीं आया था लेकिन माँ के जाने के बाद समझ आया कि मेरे पास माँ है कहना- कितने गर्व और खुशकिस्मती की बात होती है जो कि मेरी नहीं है।

मेरी बहन भी एक माँ है अपने बच्चे की माँ लेकिन उसे भी माँ की कमी सालती रहती है- मतलब माँ को भी एक माँ की जरूरत होती है ये वो जरूरत है जो जिंदगी के किसी भी पड़ाव पर आपको याद आती ही रहती है- कचोटती रहती है आपको मन ही मन- माँ जिससे आप जमाने भर की शिकायत कर सकते हो- जिससे अपने हर झगड़े हर मुसीबत हर बीमारी हर मुश्किल के बारे मे बात कर सकते हो- क्योकि माँ सिर्फ माँ ही नही होती बल्कि एक अच्छी दोस्त भी होती है।

मेरी माँ भी मेरी एक अच्छी दोस्त थी मेरी शायद ही कोई ऐसी बात हो जो उनसे छिपी रह गई हो- मुझे याद है कि किस तरह उन्हे मेरी हर इच्छा बोलने से पहले ही मालुम हो जाती थी- स्कूल से वापस लौटने पर वो मेरा इंतजार करती मुझे मिलती- कल किस सब्जेक्ट का होमवर्क करना है किस सब्जेक्ट का क्लास टैस्ट है एक्ज़ाम की स्कीम वगैरह उन्हे ऐसे याद होता था मानो मेरे और मेरी बहन के लिए जीना ही उनका एकमात्र मकसद हो।

मेरी माँ से मेरी आखिरी बातचीत 28 नवंबर 1998 को दिन के वक्त हुई थी- मेरी उम्र करीब 20 साल की थी और मैं पहली बार दिल्ली का ट्रेड फेयर देखकर लौटा था वो मुझसे काफी देर तक बात करती रही- मेरे करियर के फ्यूचर प्लान्स के बारे मे पूछा और लंबे वक्त तक बात करने के बाद थकने की वजह से सो गई वो अस्पताल के बिस्तर पर ही लेटी थी- उनकी दोनो किडनी लगभग फेल हो चुकी थी- डायलेसिस हो नही सकती थी क्योकि उनका वजन मात्र 29 किलो रह गया था- उनका अंत जल्द ही हो सकता है कही न कही हम सब जानते थे लेकिन उसे स्वीकार करने की ताकत किसी में नही थी-

हाल ही मे 5 सिंतबर को उनका जन्मदिन था - मैने उस दिन उन्हे काफी याद किया- वो बहुत धार्मिक थी हफ्ते मे 4 दिन व्रत रखती थी- फलो को पेड़ से तोड़ कर नहीं खाती थी उन्हे लगता था कि पेड़ से फल तोड़े जाने पर पेड़ो को दर्द होता है- एनसीसी के कैडेट रही मेरी माँ इतिहास मे बी ए तक पढ़ी थी- नाना जी आर्मी मे मेजर थे इसलिए घर का माहौल बेहद अच्छा था लेकिन उनका अंत इस तरह बीमारी के साथ होगा किसी ने कभी सोचा तक न था-

मेरे लेखन की शुरूआत उनके सामने ही हो गई थी- उन्हे अच्छा लगता था जब मेरी रचनाये कही पर प्रकाशित होती थी। आज मेरे पास काफी कुछ है लेकिन जब भी मैं अपने पैसे खर्च करके कुछ खरीदता हूँ तो एक ही बात बहुत चुभती है और वो ये कि मैं कभी अपनी कमाई से अपनी माँ के लिए कुछ भी नहीं खरीद पाया मैं किसी लायक बन पाता इससे पहले ही मां का आंचल मेरे हाथो से छूट गया- ये एक ऐसी छटपटाहट है जिसका कोई इलाज नहीं लेकिन यंहा लिखकर अपने दिल का बोझ हल्का कर रहा हूँ।

एक ही बात कहूँगा कि अगर आपके पास माँ है तो उसकी इज्जत करना सीखो ये ऊपरवाले का ऐसा आनमोल तोहफा है जिसका मोल वही जानता है जिसके पास ये नहीं है।

माँ तू महान है

माँ, वो शब्द जिसके बारें मे सोचतें ही आंखों के सामने एक ममतामयी मूरत आ जाती है। ये वो शब्द है जिसको शब्दों या वाक्यों से परिभाषित करना असम्भव है। और मेरे लिए तो ये और कठिन कम है क्योकि शब्दों से जादू का खेल, मुझे नही आता।

माँ की ममता तो निश्वार्थ होती है, तो फिर कुछ शब्द कहके इसे अपमानित क्यो किया जाएँ?
मैं अब ये नही कहूँगा की मेरी माँ इस जगत की सबसे अच्छी माँ है क्योकि मैं जानता हूँ सब यही सोचेंगे और फिर हो जायेगा व्यर्थ का द्वंध। और वैसे भी इसकी तुलना करना.........

मैं, अंकित, यहाँ इंदौर में अपने घर से काफी दूर पढने के लिए आया हूँ। कोई भी दिन ऐसा नही जिस दिन मैंने माँ को याद नही किया हों। जैसा की मैंने पहले ही कहा है माँ को शब्दों में नही बाँध सकतें।

पर किसी ज़माने की एक कहावत याद आ गई, "जहाँ ना पहुचें रवि, वह पहुचे कवि। "
इसीलिए मैं अपनी चोटी सी कविता इस दुनिया की सभी माताओं को समर्पित करना चाहूँगा। आप तो जानते ही है की मैं कविता नही करता पर फिर भी बस ऐसे ही दिल चाहा, तो हाजिर है आपके सामने।
माँ तू महान है
गाए देवता भी तेरे गुणगान है।
तुने हमें चलना सिखाया
भला क्या है, बुरा क्या है
ये भी बताया।
तू किए कितने अनगिनत एहसान है
माँ......तू महान है।
रोती है तू, जब रोतें है हम
हसंती है तू, जब हसतें है हम
तुझमे जरा भी ना अभिमान है।
माँ...तू महान है।।
अब आगे नही लिख पाउँगा। इसके लिए माफ़ करें। और मुझे लगता है की ये पंकितयां भी कही से सुनी हुई ही है।
तो अब अंकित आपसे ये कह कहके विदा लेता है।
M = Motivater
O = Onlyone
T = Truelove
H = Heartiest
E = Exceptional
R = Responsible
That's Mother. So never Forget to Love Your Mother.
अंकित
प्रथम

माँ चिट्ठे की चिट्ठानीति!

हजारों साल से "माँ" मानव समाज की मुख्य धुरी रही है, लेकिन अधिकतर समूहों ने पलट कर माँ को न तो धन्यवाद दिया, न आभार माना. लेकिन चुने हुए कुछ मातृसत्तात्मक समूहों में स्थिति भिन्न रही पर जनसंख्या के हिसाब से ऐसे समाज नगण्य रहे.  कुल मिला कर कहा जाये तो मानव समाज से माँ को जो कुछ मिलना चाहिये वह कम ही मिला है.

माँ चिट्ठे की स्थापना इसलिये हुई कि चिट्ठाकार एक जगह आकार अपने जीवन में अपनी माँ के रोल के बारे में, एवं समाज में माँएं क्या कर रही हैं इसके बारे में लोगों को बताये. आभार जताने का एक अच्छा तरीका होगा यह. इतना ही नहीं, हम सब एक दूसरे को यह भी बता सकते हैं कि हम सब से कहां कहां चूक हुई है एवं उसके लिये क्या किया जा सकता है.

इस चिट्ठे पर हर चिट्ठाकार का स्वागत है जो इस विषय पर लिखना चाहता है या चाहती है. यदि आप एक नोट Admin.Mataashri@gmail.com पर भेज दें तो तुरंत आपको एक "इन्वाईट" भेज दिया जायगा. जैसे ही आप उसे स्वीकार कर लेंगे, वैसे ही आप को इस चिट्ठे पर पोस्ट करने का अधिकार मिल जायगा.

माँ विषय पर आप कोई भी प्रेरणात्मक या मार्गदर्शी बात लिख सकते है. यह विषय बहुत विशाल है एवं हम आपकी सकारात्मक अभिव्यक्ति पर किसी तरह की पाबंदी नहीं लगायेंगे. आप चाहे तो अपनी मां की पूरी जीवन सचित्र यहां पोस्ट कर सकते हैं. आप चाहें तो किसी और माँ के बारे में लिख सकते है.

सिर्फ एक पाबंदी है -- आलेखों एवं टिप्पणियों का उपयोग व्यक्तिविमर्श, चरित्रहनन, पुरूषविरोध/स्त्रीविरोध, राष्ट्रविरोध, या धर्मविरोध आदि के लिये नहीं होना चाहिये. ऐसे आलेख/टिप्पणियां तुरंत हटा दी जायेंगी. लेकिन विषयविमर्श की आजादी होगी, बौद्धिक विषयों की चर्चा की सीमाओं के भीतर. मतांतर होने पर विषय के बारे में लिखें, लेखक के बारे में नहीं. ऐसा कर हम जितना अधिक मतैक्य पा सकेंगे उतना करने की कोशिश करेंगे.

आईये, माँ चिट्ठे से जुड जाईये एवं अपना आदर रेखांकित करें -- चिट्ठा नियंत्रक !!