माँ दुर्गा की पूजा का तिहवार भला है।
घर-घर में पूजा-अर्चन का दीप जला है॥
बच्चों के स्कूल बन्द, सब खिले हुए हैं।
छुट्टी औ मेला, माँ का उपहार मिला है॥
माँ की उंगली पकड़ चले माँ के मन्दिर को।
कुछ ने राह पकड़ ली नानीजी के घर को॥
गाँवों में मेला - दंगल पर दाँव चला है।
रावण का पुतला भी इसमें खूब जला है॥
मुझको भी वह दुर्लभ छाँव दिलाती माता।
शहर छोड़कर माँ के चरणों से मिल पाता॥
ममता के आँचल से लेकर मन की ऊर्जा।
नयी राह पर बढ़ने को ‘सिद्धार्थ’ चला है॥
माँ दुर्गा की पूजा का तिहवार भला है।
घर-घर में पूजा-अर्चन का दीप जला है॥
(सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी)
7 comments:
नमन माँ के नौ रूपो को... बहुत ही सुंदर अर्चना है
माँ दुर्गा की पूजा का तिहवार भला है।
घर-घर में पूजा-अर्चन का दीप जला है॥
" wah, bhut hee sunder'
regards
त्योहार का अच्छा वर्णन है।
bahut badhiya.
jay maan bhavani .
"माँ की उंगली पकड़ चले माँ के मन्दिर को।
कुछ ने राह पकड़ ली नानीजी के घर को॥"
वाह क्या खुबसूरत गीत लिखा है त्रिपाठी जी आपने ! माँ के साथ माँ महामाया का गुणगान ! इतने सुंदर पूजा अर्चन के लिए धन्यवाद !
आपने कविता मे पूजा और त्यौहार सभी को समेट कर बहुत अच्छा चित्रण किया है ।
माँ के यह रूप और साथ में त्योहारों का लिखना बहुत अच्छा लगा
Post a Comment