Tuesday, October 7, 2008

माँ दुर्गा की पूजा का तिहवार भला है...!!


माँ दुर्गा की पूजा का तिहवार भला है।
घर-घर में पूजा-अर्चन का दीप जला है॥
बच्चों के स्कूल बन्द, सब खिले हुए हैं।
छुट्टी औ मेला, माँ का उपहार मिला है॥

माँ की उंगली पकड़ चले माँ के मन्दिर को।
कुछ ने राह पकड़ ली नानीजी के घर को॥
गाँवों में मेला - दंगल पर दाँव चला है।
रावण का पुतला भी इसमें खूब जला है॥

मुझको भी वह दुर्लभ छाँव दिलाती माता।
शहर छोड़कर माँ के चरणों से मिल पाता॥
ममता के आँचल से लेकर मन की ऊर्जा।
नयी राह पर बढ़ने को सिद्धार्थ चला है॥

माँ दुर्गा की पूजा का तिहवार भला है।
घर-घर में पूजा-अर्चन का दीप जला है॥

(सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी)

Sunday, October 5, 2008

माँ की कामना !



काफी दिनों से माँ पर लिखने की सोच रहा था, अपनी माँ के बारे में कुछ याद ही नही मगर भावः विह्वल होकर जब भी माँ याद आती है तो एक काल्पनिक आकृति अवश्य उभरती है कि मेरी अम्मा ! भी शायद ऐसी ही होगी ! जब पहली बार डॉ मंजुलता सिंह से मिला तो यकीन नही कर पाया कि क्या कोई महिला ७० वर्ष की उम्र में, इतनी व्यस्त और कार्यशील हो सकती हैं ! डॉ मंजुलता सिंह Ph.D., जन्म १९३८ , लखनऊ यूनिवर्सिटी से गोल्ड मेडलिस्ट, ४० वर्ष शिक्षक सेवा के बाद दौलत राम कॉलेज, दिल्ली यूनिवेर्सिटी हिन्दी विभाग से, रीडर पोस्ट से रिटायर, रेकी ग्रैंड मास्टर (My Sparsh Tarang) के रूप में लोगों की सेवा में कार्यरत ! सात किताबें एवं २०० से अधिक लेख प्रकाशित हो चुके हैं, इस उम्र में भी वृद्धजनों की सेवा में कार्यरत ! ममतामयी ऐसी कि उनको छोड़कर उठने का दिल ही नही कर रहा था ! ऐसे सशक्त हस्ताक्षर की एक कविता "माँ " में प्रकाशन हेतु भेज रहा हूँ !

माँ की कामना


धरती हैं माँ ,

पृथ्वी हैं माँ

सबके पेरो के नीचे हैं माँ ।

देखती हैं , सुनती हैं , सहती हैं

कोई धीरे धीरे चलता हैं

कोई धम - धम चलता हैं

कोई थूकता है ,

कोई गाली देता हैं

कोई कूड़ा गिराता है

कोई पानी डालता हैं

सभी बच्चे हैं उसके

माँ पृथ्वी कुछ नहीं कहती

कहे भी किससे ?

और क्या कहे ?

जन्म दिया हैं जिनको

उनसे कैसे बदला ले ?

कैसे दंड दे ?

उसे तो क्षमा करना हैं ,

क्षमा - बस क्षमा वहीं उसका सुख हैं ,

वही उसकी सफलता

उसके बच्चे कही भी ,

कैसे भी जाये उसकी छाती पर चढ़ कर

बस आगे बढ़ कर यही उसकी कामना हैं ।

- डॉ मंजुलता सिंह

Wednesday, October 1, 2008